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भारत की शिक्षा पद्धति को भारतीय संस्कृति और ज्ञानार्जन परंपरा पर आधारित बनाने की जरूरत

Admin
Last updated: 2023/11/26 at 10:09 AM
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9 Min Read
Grukul| tradition
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स्‍वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ ठाकुर का दृढ़ विश्वास था कि स्वतंत्रता के बाद भारत के विश्व पटल पर अपनी पूर्ण गरिमा और आत्मसम्मान के साथ उभरने के लिए आवश्यक है कि ऐसी शिक्षा हर व्यक्ति का मार्ग प्रशस्त करे, जो विदेशों से लाकर रोपित न की गई हो, बल्कि जिसकी जड़ें गहराई तक भारत की संस्कृति और ज्ञानार्जन परंपरा से जुड़ी हुई हो।

बिना किसी भेदभाव के भारत के हर व्यक्ति की समसामयिक संदर्भ में हर प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति का रास्ता उजागर करती हो। रवींद्रनाथ का विचार था कि शिक्षा हमेशा प्राकृतिक वातावरण में ही दी जानी चाहिए, जहां बाल्यकाल में ही विद्यार्थी प्रकृति से जुड़ जाए, और अपने जीवन में मनुष्य तथा प्रकृति के संबंधों की संवेदनशीलता को पूरी तरह समझे तथा उसे बनाए रखने में अपने उत्तरदायित्व के निर्वाह के लिए तैयार हो सके।

प्राचीन भारतीय गुरुकुल व्यवस्था से प्रभावित होकर रवींद्रनाथ ने शांतिनिकेतन में स्कूल खोला और फिर धीरे-धीरे विश्वविद्यालय बनाया। उसे समेकित शिक्षा और संस्कृति के एक अंतरराष्ट्रीय सम्माननीय केंद्र बना दिया। स्वतंत्रता के बाद यह भारत के नीति निर्धारकों पर निर्भर करता था कि वे इस विकल्प का अपनी नीतियों में कितना सामंजस्य करें।

रवींद्रनाथ ने मनुष्य के शरीर की इस नैसर्गिक आवश्यकता को भी पहचाना था कि उसे किसी भी प्रकार के ऐसे बंधन में न डाला जाए, जहां एक ही अवस्था में उसे घंटों बैठने की मजबूरी हो! उन्होंने देखा-अनुभव किया था कि स्कूल के कमरे की चारदीवारी के अंदर और अध्यापक के विकट अनुशासन के दबाव में कितने ही घंटे ऐसा होता है।

गांधीजी इसी को दूसरे ढंग से कहते थे। उन्होंने तकली और चरखे द्वारा यह सुनिश्चित किया था कि बच्चों के हाथ-पैर सदा चलते रहें, यानी उनके शरीर को गति और स्पंदन निर्बाध रूप से उपलब्ध हों। कृषि कार्य तथा बागबानी से जुड़ने पर यह स्वत: स्वरूप ले लेता है। उन्होंने भी दक्षिण अफ्रीका में दो आश्रम स्थापित किए, जिनमें बच्चों के पढ़ने की व्यवस्था की।

उनके द्वारा प्रतिपादित ‘नई तालीम’ की संकल्पना में उनका पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़े उन व्यक्तियों से विशेष रूप से सीधा सरोकार था, जो सदियों से प्रताड़ित थे, सामाजिक रूप से बहिष्कृत और सांस्कृतिक रूप से प्रतिबंधित थे। उन्हें मानवीय स्तर पर सम्मानपूर्ण जीवन तक पहुंचाने के लिए वे सदा संवेदनशीलता के साथ संलग्न रहे। नई तालीम भारत की उस जनता के प्रति समर्पित थी, जो गांवों, खेतों और उससे जुड़े अन्य कार्यों में लगे हुए थे।

स्वामी विवेकानंद भारतीय संस्कृति की निरंतरता और वैश्विकता के सबसे प्रखर विद्वान मनीषी थे। उन्होंने भारतीय युवाओं को अपने अंदर की शक्ति को पहचानने का आह्वान किया। उनके द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन ने देश-विदेश में अनेक केंद्र और स्कूल खोले जो आज भी भारतीय संस्कृति को आधार बनाकर शिक्षा प्रदान करने और व्यक्ति निर्माण में संलग्न हैं। वे यह अच्छी तरह जानते थे कि जड़ों से जुड़ी शिक्षा योजना भी अपने मन्तव्य को तभी प्राप्त कर सकेगी, जब समाज अपने ऊपर स्वयं द्वारा थोपी गई रूढ़ियों से बाहर निकले।

भारत में नई शिक्षा नीति में कहा गया है कि उसे भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में तैयार किया गया है। यह अपने आप में अत्यंत आशाजनक वक्तव्य है। इसके क्रियान्वयन के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण होगा कि शिक्षक प्रशिक्षक महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम निर्माण के प्रति दृष्टिकोण में आमूलचूल परिवर्तन किया जाए। यह नहीं होना चाहिए कि कमरे के अंदर बिठा कर भावी अध्यापकों को तीन-चार घंटे तक लगातार भाषण दिए जाएं और लिखित परीक्षा द्वारा उनकी उपलब्धि का आकलन किया जाए।

यह भी तो संभव है कि वे पाठ्य सामग्री पढ़कर आएं और अपने अध्यापकों से चर्चा करें और सब मिलकर भी करें। अध्यापकों का अधिकांश समय स्कूल के बच्चों के साथ खुले वातावरण में क्यों न बिताया जाए। उनके साथ वे स्वयं ही सीख जाएंगे कि बच्चों की आवश्यकताएं क्या हैं और उनकी पूर्ति के लिए किसी भी विषय पर निष्पादन करते समय क्या-क्या आवश्यक तैयारी करनी चाहिए।

रवींद्रनाथ ने बच्चों से एक वादा किया: ‘आप मेरे सान्निध्य में आए हैं, मैं पूरा प्रयत्न करूंगा कि मैं अपने पुरखों और ऋषियों, मुनियों द्वारा दिखाए गए मार्ग पर ही चलूं और उससे विचलित न होऊं।’ उनके ये शब्द किसी भी अध्यापक और पाठ्यक्रम तथा पाठ्य पुस्तक बनाने वालों के लिए संपूर्ण प्रेरणा प्रदान कर और एक नया रास्ता खोल सकते हैं। अगर अध्यापक और विशेषकर अध्यापक-शिक्षक अपने आचरण को रवींद्रनाथ द्वारा इंगित रास्ते पर ढाल लें तो निश्चित रूप से भारत के लोग सदाचरण के मार्ग पर चल सकेंगे।

कोई भी बड़ा परिवर्तन तभी संभव होगा जब उसका प्रारंभ स्कूलों से किया जाए। यानी दृष्टिकोण परिवर्तन का सबसे विश्वस्त उपाय शिक्षा द्वारा ही संभव है और इसकी शुरुआत उसी समय से होनी चाहिए जब बच्चों की शिक्षा शुरू की जाती है। ऐसा करने के लिए सबसे पहले भारत को इस विश्वास को पुन: जागृत करना होगा कि उसके अंदर अपनी ज्ञानार्जन परंपरा की शक्ति द्वारा न केवल देश की समस्याएं सुलझाने की क्षमता है, बल्कि विश्व स्तर पर भय, आशंका, अविश्वास और हिंसा की वर्तमान स्थिति को बदल सकने की पूरी योग्यता है।

इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए विश्व के समक्ष भारत का ऐसा चित्र प्रस्तुत करना होगा, जिसमें उसकी परंपरागत विविधता की स्वीकार्यता का स्पष्ट दर्शन विश्व को हो सके। विश्व में कोई ऐसा देश नहीं है, जिसमें मानव जीवन और प्रकृति दोनों में ही असीम विविधताएं एक साथ उपस्थित हों, जितना कि भारत में है।

भारत ने अपने इतिहास में यह भी सिद्ध किया है कि उसने कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया, अत्याचार और शोषण नहीं किया, बल्कि हर जगह अपने ज्ञान और वैश्विक सदाचरण तथा मूल्य आधारित जीवन जीने की आवश्यकता का संदेश ही पहुंचाया। स्कूल स्तर पर बड़े परिवर्तन लाने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व विश्वविद्यालयों का भी होगा।

सामान्यतया माना जाता है कि किसी भी विश्वविद्यालय का उत्तरदायित्व वहां पर ज्ञान प्राप्त करने का उचित वातावरण तैयार करना होता है। शिक्षा देना इसके बाद आता है। यही अवधारणा शिक्षक प्रशिक्षक महाविद्यालयों और स्कूलों तक साकार करनी होगी और इसे नियमित रूप से व्यावहारिकता के साथ लागू करना होगा।

इस समय विश्व में अनेक कारणों से जो परिस्थितियां बनी हैं, उनमें भारतीयों की क्षमता, उनके आचरण और उनके इतिहास के आधार पर निष्पक्ष विचार रखने वाले विश्व के सभी महत्त्वपूर्ण देश बड़ी-बड़ी अपेक्षाएं कर रहे हैं। भारत के युवाओं ने अपनी बौद्धिक क्षमता से विश्व भर में अपने लिए एक सम्माननीय स्थान निर्मित कर लिया है।

देश के हर शिक्षा संस्थान- स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक- का अगला लक्ष्य ऐसे अध्यापक प्रशिक्षित करने का होना चाहिए, जो भारत के लोगों के जीवन से जुड़ाव को प्राथमिकता मान कर कार्य करें। अगर देश इसमें सफल हो जाता है, तो वैश्विक स्तर पर भारत की उपस्थिति स्वत: ही स्वीकार्य हो जाएगी। उसके लिए प्रयास नहीं करना पड़ेगा।

जब शिक्षा संस्थान इस प्राथमिकता को लेकर अपनी कार्य पद्धति में आवश्यक परिवर्तन करेंगे, तो नवाचार बढ़ने के नए रास्ते स्वत: ही खुलेंगे। हर व्यक्ति को शिक्षा ही नहीं मिलेगी, ऐसे कौशल भी प्राप्त हो सकेंगे, जिनसे वह आत्मनिर्भर हो सकेगा और अपनी क्रियात्मकता के आधार पर जीवन की दिशा तय करने में भी सक्षम होगा।

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