अजीत दुबे
भारतीय संस्कृति में समाहित पर्व दरअसल, प्रकृति और मानव के बीच तादात्म्य स्थापित करते हैं। यहां पर्व-त्योहार सिर्फ औपचारिक अनुष्ठान मात्र नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न अंग हैं। पर्व-त्योहार जहां मानवीय जीवन में उमंग लाते हैं, वहीं पर्यावरण संबंधी तमाम मुद्दों के प्रति भी किसी न किसी रूप में जागरूक करते हैं। लोक आस्था का महापर्व छठ, ऊर्जा का पर्व है।
स्वच्छता, सामुदायिकता और पवित्रता इसका आधार है। छठ पूजा में सूर्य के साथ-साथ उनकी दो शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा), दोनों को अर्घ्य दिया जाता है। यह जीवन की हर परिस्थिति में साथ देने का बिंब है। गरिमापूर्ण व्यक्तित्व का उदय और अस्त दोनों गरिमापूर्ण होता है। सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं, वे समस्त अभीष्टों की पूर्ति करते हैं- ‘किं किं न सविता सूते…!’
सूर्योपासना के इस महापर्व में लोग अपनी चेतना को जागृत करते हैं और उनसे एकाकार होने की अनुभूति प्राप्त कर आनंदित होते हैं। छठ पर्व सूर्य की ऊर्जा की महत्ता के साथ-साथ जल और जीवन के संवेदनशील रिश्ते को भी संजोता है। सार संक्षेप यह है कि सूर्य की कृपा से ही सब प्राप्त होता है, इसलिए उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का यह तरीका हमारे ऋषि-मुनियों ने तब विहित किया, जब आधुनिक विज्ञान ने प्रकाश संश्लेषण का सिद्धांत अभी खोजा नहीं था। यह पर्व वैदिक, पौराणिक, तांत्रिक किसी भी प्रकार के कर्मकांड से सर्वथा मुक्त है। विशुद्ध तौर पर समाज का उत्सव, आसन्न ठंडे मौसम से पहले घरों-गलियों और परिवेश की सफाई का उत्सव।
लोक मानस में छठ एक सांस्कृतिक पर्व के तौर पर अपनी व्यापकता स्थापित कर चुका है। यह महापर्व आज भोजपुरिया पहचान से भी जुड़ गया है। पूरब की एक और खासियत है कि यहां के लोग जहां भी गए, अपनी भाषा, संस्कृति एवं मूल्य साथ ले कर गए। छठ भी उसी संस्कृति का हिस्सा है। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि केवल भोजपुरिया लोग छठ करते हों, बल्कि सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में उल्लास और निष्ठा के साथ मनाया जाता है।
साल में ऋतु परिवर्तन के संधि का काल, यानी चैत और कार्तिक महीने में छठ महापर्व मनाया जाता है। वैज्ञानिक शोधों से यह सिद्ध हो गया है कि छठ के दिन सूर्य की किरणों में विशेष प्रभाव मौजूद होता है। यह ग्रह-नक्षत्र के सुयोग से संभव होता है। चार दिवसीय यह पर्व व्रतियों को ऊर्जा से भर देता है। छठ लौकिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का अनुपम पर्व है।
पुरबिया संस्कृति के प्रतीक इस महापर्व में एक ओर लोकमन की सहजता है तो वहीं वैज्ञानिकता को सबल करने वाली आस्था भी। नहाय-खाय के दिन अगर चने की दाल, लौकी की सब्जी के साथ अरवा चावल का प्रसाद मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी की आंच पर बनता है। पंचमी यानी खरना के दिन भर के निर्जला उपवास के पश्चात घर की चक्की में पिसे गेहूं के आटे की रोटी के साथ रसियाव का नमक रहित खरना होता है।
फिर छत्तीस घंटे के निर्जला उपवास में संध्याकाल में नदी या तालाब के किनारे अस्तगामी सूर्य को अर्घ्य और सिसोपता के पास बैठ कर पूजन। फिर घर के आंगन में कोसी भरा जाता है। सांस्कृतिक पहचान के इस महापर्व के साथ जुड़ना और लोक आस्था की पवित्रता को बरकरार रखना बेहद जरूरी है।
हालांकि यह भी सुखद तथ्य है कि छठ पर आधुनिकता और बनावटीपन का कोई असर नहीं है। यह आज भी अपने असली स्वरूप में मौजूद है। इस पूजा में सुबह के अर्घ्य के बाद प्रसाद मांग कर खाने की एक विशेष परंपरा रही है। इसके पीछे ये मान्यता भी बताई जाती है कि इससे अहंकार नष्ट होता है। भारत की इस महान परंपरा के प्रति हर किसी को गर्व होना बहुत स्वाभाविक है।
पौराणिक मान्यता में सूर्य पूजा एवं सूर्य मंदिर की स्थापना का आदि प्रसंग भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब के जुड़ता है। ऐसी कथा मिलती है कि साम्ब, जिनका स्वरूप बिल्कुल कृष्ण सदृश्य था, को गोपियों ने कृष्ण समझ कर रासलीला रचा और साम्ब सत्य का उद्घाटन करने के बजाय रासलीला में सम्मिलित हुए। कुपित कृष्ण के शापवश उन्हें कुष्ठ रोग से ग्रसित होना पड़ा।
क्रोध शांत होने पर और उनके क्षमाप्रार्थी होने पर भगवान कृष्ण ने क्षमादान देते हुए सूर्योपासना का उपदेश दिया। साम्ब ने वर्तमान मुल्तान (प्राचीन नाम मूलस्थान) में चेनाब नदी के किनारे सूर्यमंदिर स्थापित किया और उनकी उपासना कर कुष्ठ रोग से मुक्त हुए। लोक परंपरा में आज भी चर्मरोगों से पीड़ित लोगों को रविवार का व्रत, नमक का त्याग और सूर्योपासना करने का उपदेश दिया जाता है। ऐसा दृष्टांत मिलता है कि वही मूर्ति यमुना नदी में प्रवाहित होते कालपी में स्थापित हुई। फिर विभिन्न नदियों में प्रवाहित होते हुए कोणार्क पहुंची। मूलत: यह सूर्य की उपासना का ही पर्व है, जिसके अनुष्ठान में एक तरफ पौरोहित्य का सर्वथा अभाव है, तो दूसरी तरफ पवित्रता का पूरा प्रयोजन।