अपने कॉलेजियम की सिफारिशों के पेंडिंग रहने पर सुप्रीम कोर्ट खफा है। इस कदर नाराज है कि जस्टिसेज ने ओपन कोर्ट में अटार्नी जनरल को फटकार लगाकर कहा कि अब से वो हर 10 दिनों में इस केस को उठाने जा रहे हैं। हालांकि एजी ने उनसे दरख्वास्त की कि वो उनको 1 हफ्ते की मोहलत दें। वो सरकार से इस बारे में निर्देश हासिल करना चाहते हैं। कोर्ट ने उनकी बात को मानकर 7 दिन का समय दे दिया।
दरअसल, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस सुधांशु धूलिया को तब गुस्सा आया जब वो बेंगलुरु के एक वकीलों की संस्था के साथ एनजीओ कॉमन काज की रिट पर सुनवाई कर रहे थे। एनजीओ की तरफ से पेश सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कोर्ट को बताया कि कॉलेजियम की 70 सिफारिशें अभी तक केंद्र के पास लंबित हैं। इनमें कुछ मसले काफी संवेदनशील हैं। वो मणिपुर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की खाली पड़ी कुर्सी की तरफ इशारा कर रहे थे। हिंसा से झुलस रहे मणिपुर को कॉलेजियम की सिफारिश के बाद भी नया चीफ जस्टिस नहीं मिल सका है।
प्रशांत भूषण ने कहा कि स्थिति विकट होती जा रही है। कई उम्दा वकील जिनको कॉलेजियम जज बनाना चाहता था वो अपने नाम वापस ले रहे हैं। जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा कि उनको पता है कि कुछ बेहतरीन वकील अब जज बनने के इच्छुक नहीं हैं, क्योंकि उनको लगता है कि कॉलेजियम की सिफारिशों पर केंद्र देरी से अमल कर रहा है। कई सिफारिशों को वो दबाकर भी बैठ गया है। इससे उनको डर लगता है।
जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा कि बार बार कहने के बावजूद सरकार सिफारिशों पर नोटिफिकेशन जारी नहीं कर रही है। उनको लगता है कि अब इस केस में कुछ न कुछ तो करना ही पडे़गा। जस्टिस कौल ने कहा कि वो हर 10 दिनों में इस केस की सुनवाई करने जा रहे हैं। उनको लगता है कि केंद्र इस तरह से मानने वाला नहीं है। खास बात है कि कॉलेजियम में जस्टिस कौल का नंबर सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ के बाद दूसरा है।
ध्यान रहे कि केंद्र और सुप्रीम कोर्ट के बीच बीते साल में उस समय टकराव बढ़ गया था जब शीर्ष अदालत ने बीते नवंबर माह में सरकार को अवमानना का नोटिस जारी कर दिया था। उसके बाद तत्कालीन कानून मंत्री किरेन रिजेजु ने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ बयानबाजी भी की थी। उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी सुप्रीम कोर्ट की आलोचना करते हुए कहा था कि जजों की नियुक्ति और तबादले पर सरकार का हक संवैधानिक है।