सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के एक फैसले के कुछ हिस्से पर शुक्रवार को नाराजगी जताते हुए “बेहद आपत्तिजनक और पूरी तरह से अनुचित” बताया। कलकत्ता हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि किशोरियों को दो मिनट के आनंद के बजाय अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा था कि जब वह बमुश्किल दो मिनट के यौन सुख का आनंद लेने के लिए तैयार हो जाएगी तो वह हारी हुई होगी
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि पहली नजर में उसका विचार है कि “न्यायाधीशों से अपने व्यक्तिगत राय व्यक्त करने या उपदेश देने की अपेक्षा नहीं की जाती है।” सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ये टिप्पणियां पूरी तरह से संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत किशोरों के अधिकारों का उल्लंघन हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर स्वत: संज्ञान लिया और पश्चिम बंगाल सरकार और अन्य को नोटिस जारी किया। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को यह बताने को कहा कि क्या फैसले के खिलाफ अपील दायर की जाएगी। शीर्ष अदालत ने अदालत की सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान को न्याय मित्र नियुक्त किया और अधिवक्ता लिज़ मैथ्यू को न्याय मित्र की सहायता के लिए नियुक्त किया।
उधर, प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने शुक्रवार को कहा कि एक न्यायाधीश के रूप में वह कानून और संविधान के ‘सेवक’ हैं। जब प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ आज की कार्यवाही के लिए बैठी तो अधिवक्ता मैथ्यूज जे. नेदुम्पारा ने अदालत के समक्ष एक मामले का उल्लेख किया। वकील ने पीठ के समक्ष कॉलेजियम प्रणाली में सुधारों की जरूरत और वरिष्ठ अधिवक्ता पद समाप्त किये जाने की जरूरत का उल्लेख किया।
पीठ में न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल रहे। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, ‘‘आपको अपने दिल की बात सुनने की आजादी है। प्रधान न्यायाधीश के रूप में, बल्कि इससे भी अधिक महत्वपूर्ण, एक न्यायाधीश के रूप में मैं कानून और संविधान का सेवक हूं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘मुझे जो जिम्मेदारी दी गई है, मुझे उसका पालन करना होगा। मैं यह नहीं कह सकता कि मुझे यह पसंद है और मैं यह करुंगा।’’ शीर्ष अदालत ने इस साल अक्टूबर में वरिष्ठ अधिवक्ता के पद को चुनौती देने वाली एक याचिका खारिज कर दी थी।