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Blog: बिहार की त्रासदी, जाति जनगणना का सच- सिर्फ जातीय विभाजन और पूर्वाग्रह

Admin
Last updated: 2023/11/19 at 9:59 AM
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9 Min Read
nitish kumar | bjp | bihar caste survey |
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बिहार में जातीय जनगणना बुलबुला साबित हुई। इसके प्रवर्तकों को जिस स्तर पर बहस और संघर्ष की अपेक्षा थी, उनमें कुछ भी नहीं हुआ। यह आश्चर्य और हताशा का विषय उनके लिए जरूर है, जो बिहार का होकर भी बिहार के चित्त को पहचान नहीं पाए। यहां जातीय विभाजन और कुछ हद तक पूर्वाग्रह पर आधारित परस्पर कटुता अवश्य है, लेकिन उसका उद्गम खुद समाज न होकर, राजनीति है।

राजनीति अपने संवर्धन के लिए अपने अनुकूल सामाजिक चेतना पैदा करती है। वही प्रयास चल रहा है। इस प्रयोग को बिहार का समाज लंबे समय से प्रत्यक्ष गवाह की तरह देख और भुगत रहा है। प्रयोगकर्ता दो-ढाई दशक पुरानी सोच के आईने में समाज को देख रहे हैं। वे लोगों में आए बदलाव को समझ नहीं पा रहे हैं और जातीय पहचान को चरित्र का अपरिवर्तनीय और स्थायी हिस्सा मान कर चल रहे हैं। जब राजनीति सीमित विकल्पों के भंवर में फंस जाती है, तब राजनीतिकों का आत्मविश्वास ऐसा ही होता है।

बिहार में अत्यंत व्यवस्थित और समाजशास्त्रीय तरीके से प्रगतिशीलता को प्रतिक्रियावाद से विस्थापित किया गया है। हर विचार की आयु होती है और पुरानी राजनीति भी अब आयु पूरी कर चुकी है। तभी तो जातीय जनगणना, जिसे सुनामी समझ कर लाया गया, पानी का बुलबुला बन कर रह गई।

बिहार समाज-संस्कृति-राजनीति की अपनी विरासत तलाश रहा है। जो लोग ‘माला मंच माइक’ तक सीमित रहते हैं, वे इस भूख का अंदाजा नहीं लगा सकते हैं। वे सामने की भीड़ को देख कर अपने आपको चक्रवर्ती मान लेते हैं। लोकतंत्र में ऐसा नहीं होता है। गुणात्मकता की गिरावट आम लोगों को बेचैन करती है और वे जैसे ही प्रगतिशील पात्रता को देखते हैं, उस जातीय मानसिकता के चक्रव्यूह से बाहर निकल जाते हैं।

बिहार की विरासत इसे संपुष्ट करती है। मूलत: यह गणतंत्रवादी रही है। दुनिया की प्राचीनतम लोकशाही लिच्छवी से शुरू हुई। यह प्रकारांतर से धुंधली जरूर हुई, लेकिन धूल-धूसरित कदापि नहीं हुई। हाल के दशकों में जिस प्रवृत्ति और उदाहरणों को इसने प्रस्तुत किया, वह इसके चित्त के अपराजेय स्वरूप को दर्शाता है। आचार्य जेबी कृपलानी सीतामढ़ी और भागलपुर से लोकसभा के लिए चुने गए थे। शायद इनके मतदाताओं में एक भी सिंधी नहीं था।

समाजवादी मधु लिमये मुंगेर और बांका से चुनाव जीत कर संसद में जब पहुंचे या जार्ज फर्नांडीज मुजफ्फरपुर से सांसद बने, तब इनकी जाति-बिरादरी, जन्मस्थान चुनावी विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाया। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। जातीय-सांप्रदायिक संकीर्णता का असर तो पूरे देश में है, पर बिहार में सामंतवाद की प्रबलता रही है।

बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में त्रिवेणी संघ की स्थापना दरअसल, कांग्रेस की मार्फत हो रहे व्याप्त सामंतवाद का प्रतिकार ही था। राजनीतिक-सामाजिक प्रगतिशीलता का भी यहां अलग चरित्र रहा है। राजनेता यहां सामाजिक प्रगतिशीलता का भी नेतृत्व करते थे। इसलिए अलग से सामाजिक सुधार आंदोलन नहीं पनप पाया। सहजानंद सरस्वती, राजेंद्र प्रसाद, कृष्ण बल्लभ सहाय, श्रीकृष्ण सिंह, जगत नारायण लाल और जगजीवन राम जैसे उदाहरणों की प्रचुरता है।

जब कामाख्या नारायण सिंह जैसे प्रभुत्व वाले जमींदारों का समाज-राजनीति में प्रत्यक्ष या परोक्ष वर्चस्व था, तब बिहार विधानसभा के पहले सत्र में ही जमींदारी उन्मूलन का विधेयक रखा गया। दिल्ली में बैठे कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के जमींदारों से अच्छे रिश्ते थे। उसे बिहार में रक्तरंजित स्थिति का भी भय सता रहा था। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। विधानसभा में कृष्ण बल्लभ सहाय और श्रीकृष्ण सिंह का भाषण गणतंत्रवादी चरित्र का परिचायक है।

भाषण की गुणवत्ता, तथ्य, तर्क, संवाद शैली लोकतंत्र के मस्तक को ऊंचा करने वाला था। सहाय का भाषण तो पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए था। जन सापेक्षता किस हद तक थी, इसे इस बात से परखा जा सकता है। सीपीएन सिंह और सहाय के बीच ‘हाट-बाजार’ जैसे सूक्ष्म, पर आर्थिक संस्कृति और परंपराओं से जुड़े विषय पर घंटों बहस हुई। वहीं इसे स्तरहीनता ने विस्थापित कर दिया है।

बिहार जातिविहीन समाज के लिए संघर्ष की प्रयोगशाला बना। इसी ने कर्पूरी ठाकुर जैसे व्यक्ति को सामाजिक-राजनीतिक नायक बना दिया। किसी ने उनकी जाति की संख्या नहीं गिनी। इसने उस सामंतवादी सोच को भी ध्वस्त किया कि शासन-प्रशासन की कला, ताकत और अधिकार कथित जातीय श्रेष्ठता में निहित है।

1974 के जयप्रकाश आंदोलन ने सर्वसमावेशी चरित्र को दो कदम और बढ़ाया। गैर-कांग्रेसवाद ने राजनीतिक कार्यकर्ता, संघर्ष की क्षमता और बदलाव की भावना तो पैदा की, पर लोहिया, दीनदयाल, सहजानंद, जेपी, कर्पूरी, श्रीकृष्ण सिंह आदि की अनुपस्थिति का फलक बढ़ता गया। अस्सी के दशक में चिंतक-कार्यकर्ता की रिक्तता की स्थिति बन गई।

विचार ही आदर्श का सृजन करता है। प्रगतिशीलता के खंडहर में सत्तावादी राजनीति ने अपना घर संवारना शुरू कर दिया। आज इस घर के सभी कमरे इसी राजनीतिक संस्कृति से सुसज्जित हैं। एक समय बिहार की कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय जनसंघ में बंगाली नेतृत्व शीर्ष पर होता था। विजय कुमार मित्रा, सुनील मुखर्जी, जगन्नाथ सरकार, जनबंधु अधिकारी जैसे नाम प्रमुख थे। समकालीन राजनीति में साझी विफलता को सामाजिक संरचना के विरोधाभासों को उभार कर ढकने की कोशिश चल रही है।

हमारी चेतना का निर्धारण इस प्रकार किया जा रहा है कि जातीय चेतना पर मुखर राजनीति वैधानिक और नैतिक तो दिखे ही, सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का विकल्पहीन रास्ता बन कर रह जाए। इसका लाभ जन सामान्य को मिल रहा या कुलीनों को, इसे समझने के लिए शोध की आवश्यकता नहीं है। सिर्फ अपने आसपास झांकने की जरूरत है। जातीय परिचय ही सबसे महत्त्वपूर्ण और निर्णायक बन गया है।

जाति जानना परंपरागत खांचेबाजी या बुद्धि विलास का हिस्सा न होकर वैधानिक और नैतिक प्रश्नावली का हिस्सा बन गया है। इसका प्रतिकार करना बिहार के राजनीतिक पाठ्यक्रम का उल्लंघन करना और विध्वंसकारी कहलाने का जोखिम उठाने जैसा है। जातिविहीन समाज पर बोलना राजनीति से बाहर जाने को सुनिश्चित करने वाला होता जा रहा है।
पर जनता कुलीनों की सत्तावादी राजनीति का विकल्प ढूंढ़ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य को हाशिये के लोगों तक पहुंचा कर प्रगतिशील विकल्प की संभावनाओं को जगा दिया है। लाभार्थी राज्य से रोटी, कपड़ा, मकान की अपेक्षा कर रहे हैं। यही कारण है कि जाति आधारित राजनीति, जिसे स्वभाव का हिस्सा मान कर चल रही है, वह मूलचेतना और चित्त नहीं है।

बालू-मिट्टी का व्यापार करने वाली राजनीति इसे नहीं समझ सकती है। इसके लिए बालू-मिट्टी में चलना पड़ता है। जो चलते हैं, वे देर से ही स्वीकार्य होते हैं। मैं विनोबा के पवनार आश्रम (वर्धा) गया तो पचासी वर्षीय विनोबा के अनुयायी गौतम बजाज ने बताया ‘बिहार के बाबा, बाबा का बिहार।’ इसका कारण बताया कि विनोबा को भूदान में सबसे अधिक सहयोग बिहार से मिला था।
जिसकी विरासत में चंद्रगुप्त, चाणक्य, तीन धर्मों- बौद्ध, जैन और सिख की आधारभूमि हो, वह इस त्रासदी से गुजरे, यह आश्चर्य का विषय है। उस राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बनना अकर्मण्यता और स्वार्थ को साधना है और उसका प्रतिकार कर प्रगतिशीलता को पुनर्स्थापित करना ऐतिहासिक आवश्यकता है।

कोई सपना आज और अभी पूरा हो जाए, यह मानना अपने साथ छल करना होगा। देर से ही होगा, पर होने का विश्वास रखना ही बड़ी उपलब्धि है। प्रतिभा, पर्यटन, परिश्रम और प्रतिमानों की मिट्टी प्रगतिशीलता की आग उगलेगी, जो वर्तमान को विरासत से जोड़ पाएगी।

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