मानव प्रजातियों की उत्पत्ति के बाद से कई सहस्राब्दी, और कई दावों के बावजूद कि होमो सेपियन्स इस ग्रह पर सबसे उन्नत और बुद्धिमान प्रजातियां हैं, मुझे यह कहते हुए अफसोस हो रहा है कि हम मूल निएंडरथल से कतई अलग नहीं हैं। उन्होंने नियमों के बिना लड़ाइयां लड़ीं और हम नियमों के बिना युद्ध लड़ते हैं।
क्या मानव इतिहास के किसी दौर में युद्ध के नियम थे? नेतिमायार (लगभग 200 ईस्वी) द्वारा रचित एक कविता में तमिल राजाओं के बीच युद्ध के बुनियादी नियमों को निर्धारित किया गया था। युद्ध छेड़ने का इरादा रखने वाला योद्धा-राजा एक पूर्व चेतावनी जारी करेगा :
आवम, आनियार पारप्पना माक्कालुम पेंड्रियम, पिनियूदाइईरम, पेनी देनपुलम वाझनारक्कू अरुंगदन इर्रुक्कम पोनपोर पुदलवार पिराथीरम,
एम अंबु कादिविदुथम, नन आरन सरमिन।
मोटे तौर पर इसका अनुवाद है
गाय, सौम्य धार्मिक पुजारी, औरते, बीमार, जिनके कोई संतान नहीं है वे अंतिम संस्कार करें,हमारे तीर तेजी से निशाना बनाएंगे जल्दी से सुरक्षित स्थानों पर चले जाएं।
सूर्योदय से सूर्यास्त तक युद्ध के मैदानों में सैनिकों के बीच लड़ाई लड़ी जाती थी। अगले दिन सूर्योदय के समय लड़ाई फिर से शुरू होती थी। तमिल में रामायण लिखने वाले महान कवि कंबन के अनुसार, माना जाता है कि राम ने थके हुए और पराजित रावण से कहा था, ‘आज आप जा सकते हैं, और कल युद्ध में लौट सकते हैं’।
यदि युद्धों को सभ्य कहा जा सकता है, तो प्राचीन युद्ध वास्तव में सभ्य थे और कुछ नियमों के अनुसार लड़े गए थे। आधुनिक युग में ऐसा नहीं है। रूस- यूक्रेन और इजराइल – हमास के बीच आज जो दो युद्ध लड़े जा रहे हैं, वे विशेष रूप से नृशंस युद्ध हैं। अंधाधुंध बमबारी हो रही है। यूक्रेन और गाजा में शहर और कस्बे मलबे में तब्दील हो गए हैं। अस्पताल और स्कूल पूरी तरह तबाह हो गए हैं। कई हजार लोग मारे गए हैं। विस्थापित लोगों को बुनियादी सुविधाओं के बिना शिविरों में रखा गया है। हजारों बेघर लोग पलायन को मजबूर हैं। पानी और बिजली की आपूर्ति काट दी गई है। खाद्य आपूर्ति बाधित हो गई है। दवाएं दुर्लभ हैं। सहायता सामग्री ले जा रहे ट्रकों को रोक दिया गया है।
युद्ध किसलिए है? रूस-यूक्रेन युद्ध में, मुद्दा प्रभुत्व का है। यूक्रेन वर्ष 1922 और 1991 के बीच सोवियत संघ का हिस्सा था। रूस के हजारों मूल निवासी यूक्रेन के विभिन्न हिस्सों में बस गए और ताकतवर समूह बन गए। स्वतंत्रता के बाद यूक्रेन नाटो देशों और रूस के बीच एक बफर था। रूस को डर है कि अगर यूक्रेन नाटो में शामिल हो जाता है, तो यह नाटो बलों को उसकी सीमा तक ले आएगा। इसलिए यूक्रेन को रूस एक ‘तटस्थ’ राज्य के रूप में चाहता है और यूक्रेन के उन हिस्सों पर भी कब्जा करना चाहता है जहां रूसी मूल के लोग हैं।
इजराइल-हमास युद्ध में भी संघर्ष जमीन को लेकर है। सभी फिलिस्तीनियों – जिनमें से कुछ का प्रतिनिधित्त्व हमास द्वारा किया जाता है – का मानना है कि यहूदी लोगों ने उनकी जमीन हड़प ली है। भूमि को फिलिस्तीन कहा जाता था और अरबों, यहूदियों और ईसाइयों द्वारा कब्जा कर लिया गया था। इजराइल राज्य संयुक्त राष्ट्र के जनादेश के तहत बनाया गया था और यहूदी लोगों को 1948 के बाद से भूमि पर बसाया गया था। आधुनिक इजराइल मजबूत राज्य बन गया है जो खुद की रक्षा करने की क्षमता रखता है। यह इस क्षेत्र में एकमात्र परमाणु शक्ति है। इतिहास फिलिस्तीनियों के पक्ष में हो सकता है, वास्तविकता यह है कि इजरायल राष्ट्र को पृथ्वी से मिटाया नहीं जा सकता।
संयुक्त राष्ट्र एक बलहीन संस्था है। वह संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र को लागू नहीं कर सकता है जो महान लक्ष्यों की बात करता है : ‘हम संयुक्त राष्ट्र के लोग आने वाली पीढ़ियों को युद्ध के संकट से बचाने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हैं, जिसने हमारे जीवनकाल में दो बार मानव जाति के लिए अनकही पीड़ा को आमंत्रण दिया, और … यह सुनिश्चित करेंगे कि सशस्त्र बलों का उपयोग नहीं किया जाएगा, लोकहित का ध्यान रखा जाएगा, और …।
इसके अलावा, युद्ध की प्रकृति बदल गई है। मनुष्य अब आमने-सामने की लड़ाई नहीं लड़ता, यह इतिहास हो गया है। अब मशीनें मशीनों से लड़ती हैं। ड्रोन मिसाइलों से लड़ते हैं। मिसाइलें एंटी-मिसाइल से लड़ती हैं। अगर दुनिया में भूमि विवादों का हल निकालने के लिए तंत्र नहीं खोजा जा सका तो युद्ध अपरिहार्य हैं। पाकिस्तान और भारत के बीच विवाद जमीन को लेकर है।
दक्षिणपंथी चरमपंथियों को इस संघर्ष को हिंदू भारत और इस्लामी पाकिस्तान के बीच के रूप में चित्रित करना सुविधाजनक लगता है। यह चतुराई भरा सिद्धांत है। दोनों देशों ने विभाजन और दो स्वतंत्रता अधिनियमों को स्वीकार किया। विवाद उस जमीन को लेकर है जिस पर पाकिस्तान ने कब्जा जमा रखा है। चीन और भारत के बीच विवाद भी जमीन को लेकर है, लेकिन यह थोड़ा ज्यादा जटिल है क्योंकि सीमा का बड़ा हिस्सा बिना सीमांकन के था और परस्पर विरोधी दावे हैं। आगे का रास्ता बातचीत है, युद्ध नहीं। जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा, ‘यह युद्ध का युग नहीं है।’
संत पापा फ्रांसिस ने रूस और यूक्रेन तथा इसराइल और हमास से शांति की बार-बार अपील की है, लेकिन कोई भी उनकी नहीं सुनता। उनके पूर्ववर्तियों में से एक ने बार-बार अपील की ‘अब और युद्ध नहीं, फिर कभी युद्ध नहीं’। इसे अनसुना कर दिया गया और कई युद्धों ने इस ग्रह को झकझोर कर रखा दिया है।
समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (1982) को 150 से अधिक देशों ने अनुमोदित किया है। ‘इंटरनेशनल ट्राइब्यूनल फार द ला आफ द सी’ से कई विवादों को हल किया गया है, जिसमें भारत और इटली के बीच दो नौसैनिकों से संबंधित विवाद भी है। हम उम्मीद करते हैं कि भूमि विवाद के लिए एक अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण होगा। इस तरह के ट्राइब्यूनल के अभाव में, युद्ध – और मौतें और विनाश – अपरिहार्य हैं।