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नैतिक मूल्यों और विचारों के प्रति समर्पण का भाव ही है संघ

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Last updated: 2023/10/22 at 11:15 AM
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राकेश सिन्हा

किसी विचार या संगठन की स्वीकृति या अस्वीकृति का अनुपात उसकी सफलता का मापदंड नहीं होता है। उसके द्वारा मूल्यों का सृजन और उससे समाज-संस्कृति की उन्नति ही मूल्यांकन का सबसे कारगर पैमाना सभ्यता के इतिहास में रहा है। दुनिया के इतिहास में ऐसे अनेक पड़ाव रहे हैं जब कोई विचार या संगठन बड़ी जनसंख्या का पर्याय और राज्य का आधार बन गया।

लेकिन वह अंतत: आधिपत्यवाद साबित हुआ और कालांतर में आंतरिक विरोधाभासों और भौतिकता के बोझ से उसे पराभव का सामना करना पड़ा। अत: संगठन या विचार के सामने जो यक्ष प्रश्न सनातन रूप से विद्यमान है वह है मूल्यों और विचारों के बीच संतुलन। मूल्यों का ह्रास या विचारों में सृजनशीलता की क्षमता में गिरावट- दोनों से ही आंतरिक विरोधाभास का जन्म होता है।

और संगठन या विचार बाह्य आलोचनाओं से नहीं बल्कि अपनी प्रतिरोधक क्षमता में गिरावट से विसर्जित हो जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ साल का इतिहास इसे एक अलग स्थान देता है। ऐसा नहीं है कि विरोधाभासों का सामना इसे नहीं करना पड़ा लेकिन उससे उबरने की क्षमता ने संगठन के बुनियाद को कमजोर होने नहीं दिया।

1925 में इसकी स्थापना नाम, नियमावली या नेतृत्व के आधार पर नहीं हुई। नामकरण के छह महीने बाद और औपचारिक नेतृत्व की घोषणा चार वर्षों के उपरांत हुई। शाखा की शुरुआत को महाराष्ट्र में प्रचलित व्यायामशाला की विविधता का अंग माना गया। संस्थापक डा हेडगेवार के निकटस्थ लोगों में भी यही धारणा बनी। हिंदू महासभा इसमें अपनी कार्य शक्ति तलाश रहा था।

इसका पहला उपयुक्त मूल्यांकन 1929 में कांग्रेस के नेता तेजराम प्रताप ने व्यायामशाला के वार्षिक उद्घाटन भाषण में किया, ‘व्यायामशालाओं की स्थापना सिर्फ शारीरिक प्रशिक्षण देने के लिए हुई है। इसके पीछे कोई नैतिक या सैद्धांतिक पृष्ठभूमि नहीं है और इस आधार पर संघ व्यायामशालाओं से भिन्न है।’ जाहिर है, भाषणों या प्रस्तावों द्वारा नहीं, बल्कि कर्म की ध्वनि से मात्र चार वर्षों में संघ ने अपनी अलग पहचान बना ली।

यह वह काल था जब हिंदुत्व के पास पुरोधाओं की कमी नहीं थी। सावरकर, बालकृष्ण मूंजे, भाई परमानंद, मदन मोहन मालवीय आदि प्रभावी और चर्चित नामों के बीच अचर्चित डा हेगडेवार ने एक नए रास्ते की रचना की। प्रचार प्रसार, पद, प्रतिद्वंद्विता के बीच वे एक प्रतिमान के रूप में उभरे। उन्होंने अपने आपको इससे दूर रखा। मंच और माला संघ संस्कृति का हिस्सा नहीं बना।

अधिकांश भारतीय नैतिक ताकत के प्रति समर्पण का भाव रखते हैं। संघ इस स्वभाव का सहचर बन गया। जो जितना नैतिकता के निकट है और निज जीवन की नींव निर्माण के लिए समर्पित करता है वही संघ की प्रथम पंक्ति का हिस्सा बनता रहा। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो नियमावली या भाषणों से नहीं चली है। इसमें निरंतरता ही संघ को आंतरिक विरोधाभासों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता देता है।

स्थापना काल से संघ ने प्रतिकूलताओं के बीच कार्य किया। ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने इसके आस्तित्व को मिटाने के लिए कभी सरकारी कर्मचारियों की भागीदारी को प्रतिबंधित किया तो कभी शाखा-परेड तो कभी प्रशिक्षण शिविरों को गैर कानूनी घोषित किया। परंतु संघ का विरोध नहीं रुका। मार्च 1934 में मध्य प्रांत के विधान परिषद में संघ पर ‘हिंदू सांप्रदायिकता’, ‘फासीवादी’ होने के सरकार आरोप को सदस्यों ने ध्वस्त कर दिया।

जिन 14 सदस्यों ने बहस में हिस्सा लिया वे विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के थे और उनमें एक भी स्वयंसेवक नहीं थे। मुस्लिम सदस्य रहमान से लेकर नागपुर विश्वविद्यालय के कुलपति मंगलमूर्ति सबने सरकारी लांक्षणा का प्रतिवाद किया। यह बहस समकालीन राजनीति में संघ-विमर्श पर एक समाधार है, जिसे पढ़ने में न वामपंथी और न ही नेहरूवादियों की रुचि है। यह भारतीय बौद्धिकता की विडंबना को भी दर्शाता है।

संघ की दार्शनिक पृष्ठभूमि संस्कृति बताई जाती है। इस संदर्भ में इसका उचित मूल्यांकन आवश्यक है। (गोट्टफ्राइड वान) हर्डर (1744-1803) और (केशव बलिराम) हेडगेवार (1889-1940) दोनों ने सांस्कृतिक पक्ष को केंद्र बिंदु बनाया। पर दोनों में बुनियादी अंतर है। जर्मन चिंतक हर्डर ने भूतकाल की विरासत को वर्तमान के लिए पुनरुत्थान पर बल दिया। संस्कृति विरासत पर ठहर गई। वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में उसकी परिभाषा तलाशी जाने लगी। इसने जातीय व नस्लीय पहचान एवं चेतना को जन्म दिया।

जर्मनी तो राष्ट्रीय रूप से समृद्ध हुआ पर सामाजिक उथल-पुथल राजनीतिक अधिनायकवाद- जिसे फासीवाद कहा गया, का कारण बना। हेडगेवार ने संस्कृति को नव मान निर्माण का आधार बनाया। स्वयंसेवक स्थान, भाषा, विरासत से जुड़ने के बावजूद स्थानीयता, भाषाई या जातिगत रूढ़ता से ऊपर उठता है। अत: संघ ने संस्कृति के दायरे में सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक तीनों पक्षों को शामिल किया है।

सामाजिक समानता के पक्ष इसे वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती के द्वारा आदिवासी और हाशिये के लोगों तक ले गया तो भारतीय मजदूर संघ आर्थिक विकेंद्रीकरण और न्याय का पक्षधर बना। इसलिए संघ को विदेशों में कार्य करने में इसकी सांस्कृतिक अवधारणा रुकावट नहीं बनी। गैर-हिंदू समाज के साथ संवाद, सहयोग और समरसता में यह असहजता महसूस नहीं करता। डा हेडगेवार से डा मोहन भागवत तक संस्कृति की प्रगतिशील परिभाषा समृद्ध होती रही। संघ कार्य के लिए 71 मराठी प्रचारक आरंभ में निकले और वे विविधता और विभिन्नता में समाकर संघ से समाज को जोड़ते रहे।

सौ साल की यात्रा में संघ ने मूल्यों का सृजन किया जिसने औपनिवेशिक और मुगल शासनों द्वारा आरोपित मानसिकता को कमजोर किया है। इसी ने औपनिवेशिक और मुगल काल के पार भारत को देखने समझने और उस इतिहास को समेटने का वातावरण एवं पात्रता का निर्माण किया है। हिंदू, हिंदुत्व, हिंदू संस्कृति आज द्वेषवादी ताकतों को अपने निकट आने के लिए प्रेरित और बाध्य दोनों कर रहा है।

भारत की आयु अब सांस्कृतिक -सभ्यताई दायरे में देखी जाने लगी है। अगर संघ ने प्रतिकूलताओं से बचने या लोकप्रिय सिद्धांतकारों, नेताओं के कोपभाजन के भय से समझौता कर लिया होता, हिंदू महासभा या कांग्रेस का सहचर बन गया होता तो इन राष्ट्रीय उपलब्धियों से भारत वंचित रह जाता।

संघ की उपार्जित शक्ति का प्रभाव राजनीति में साफ परिलक्षित होता है। पहली बार भारतीय राज्य 2014 के बाद भारतीयता को समृद्ध करने का साधन बनी है। हिंदू समाज की न्यूनता जातीय, अस्पृश्यता, आर्थिक विषमता और भाषायी द्वंद के रूप में उग्र होती जा रही है। उसकी जटिलताओं को राजनीति से परे ही सुलझाया जा सकता है।

संघ के सामने सौ साल बाद हिंदू गौरव को प्राप्त करने का सवाल है, जिसमें सामाजिक – आर्थिक प्रश्नों का ढेर देश के सामने है। संघ ने प्रतिकूलता में अपने आपको बचाया है। अब अनुकूलता में अपने आपको बचा रही है। यही मंत्र संघ को अपराजेय और असीमितता का भाव प्रदान करता है।
प्रतिकूलताओं और अनुकूलताओं के बीच से निकलकर समाजोन्नति का सनातन लक्ष्य ही इसकी संजीवनी है। यह मूल्यों और विचारों के संतुलन की परीक्षा है। जो बात मराठा अखबार ने डा हेडगेवार के निधन के बाद लिखी थी, ‘हेडगेवार का संघ तब भी मजबूती के साथ बढ़ रहा है।’ वही बात आज अक्षरश: सत्य साबित हो रही है।

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