चीन क्या बर्बाद होने वाला है? क्या चीन की गिरती हुई अर्थव्यवस्था दुनिया में मंदी लाएगी? क्या चीन अब अपने रुख को बदल रहा है? ये तमाम सवाल इसलिए क्योंकि चीन की अर्थव्यवस्था अब उस मोड़ पर पहुंचती दिख रही है, जहां से वापस लौटना उसके लिए बेहद कठिन होगा। चीन में भारी बेरोजगारी है, करोड़ों की तादाद में बने घर खाली पड़े हैं और उस पर भारी-भरकम लोन चढ़ चुका है। अब ऐसे में चीन न केवल नेपाल से लेकर श्रीलंका तक में अपनी पैठ बढ़ा रहा है, आर्थिक सहयोग विकसित कर रहा है बल्कि अपने चिर विरोधी अमेरिका की ओर भी दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है, लेकिन ये सब करने के बाद भी क्या चीन कामयाब हो पाएगा? यह बड़ा सवाल है।
चीन के प्रापर्टी सेक्टर में भारी गिरावट देखी जा रही है। चीन सरकार के एक पूर्व अधिकारी ने भी अपनी सरकार की आलोचना की है। आपको बता दें कि चीन का रियल एस्टेट सेक्टर भी भारी परेशानी से जूझ रहा है। ये परेशानी शुरू हुई थी महामारी के दौरान। चीन में घरों की मांग गिर चुकी है और इस वजह से प्रापर्टी की कीमतें भी। माना जा रहा है कि ये संकट इतना बड़ा है कि इसे सही होने में कई साल भी लग सकते हैं। पिछले करीब 30 सालों में चीन की अर्थव्यस्था ने तरक्की और सफलता हासिल की।
इस दौरान चीन में बड़े पैमाने पर निर्माण के काम किए गए। इससे वहां रोजगार पैदा हुए। लोगों को गरीबी से बाहर निकलने में मदद मिली, लेकिन अब निर्माण का ये माडल पुराना पड़ने लगा है। जानकारों का मानना है कि चीन को व्यापार पर, सर्विस सेक्टर पर ध्यान देना होगा और नियमों को आसान बनाना होगा। रिपोर्ट बताती है कि चीन में बेरोजगारी चरम पर है। जुलाई 2023 के आंकड़े बताते हैं कि 16 से 25 साल के बीच के 21.3 फीसद युवा नौकरी तलाश कर रहे हैं। यानी बेरोजगारी दर 21 फीसद से अधिक है।
आपको बता दें कि 90 के दशक से अब तक चीन की औसत विकास दर करीब 9 फीसद रही है, लेकिन अब 2023 में ये विकास दर साढ़े चार फीसद रहने का अनुमान लगाया गया है। इन हालातों को देखते हुए अब शायद चीन अपनी नीतियों में बदलाव चाह रहा है, और शायद इसीलिए नेपाल से लेकर अमेरिका तक से हाथ मिला रहा है। नेपाल के पीएम पुष्प कमल दहल प्रचंड ने हाल में चीन का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने 12 समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं।
इनके मुताबिक नेपाल और चीन कृषि से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस तक में एक-दूसरे का सहयोग करेंगे। साथ ही नेपाल और चीन के बीच सड़क संपर्क भी बेहतर किया जाएगा। अमेरिका और चीन के राजनयिक भी एक के बाद एक कई बार मुलाकात कर चुके हैं। इस दौरान न तो चीन के जासूसी गुब्बारों का जिक्र हुआ और न ही जो बाइडेन के बयानों का।
शायद अमेरिका इस तथ्य को भी समझता है कि अगर चीन डूबा तो असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा, क्योंकि चीन में मंदी आई तो दुनिया भर में मांग और आपूर्ति की चेन प्रभावित हो जाएगी। अब देखना ये होगा कि चीन और अमेरिका की बढ़ रही नजदीकियां क्या रंग दिखाएंगी।