समाज में अविश्वास, व्यग्रता और उग्रता के बढ़ते स्तर तथा फैलाव का अनुमान किसी भी दिन के समाचार पत्रों पर सरसरी निगाह डाल कर जाना जा सकता है। इस स्थिति की कष्टकर अनुभूति हर सतर्क, सजग, एवं सक्रिय नागरिक को रोजाना होती है। अधिकांश ने तो इसे अनेक दशकों से लगातार बढ़ते देखा है, और अब ‘अभ्यस्त’ हो गए हैं।
यह वर्तमान परिदृश्य का सामान्यीकरण लगता है। लेकिन हर उस व्यक्ति के लिए जो अपने परिवार, समाज और देशवासियों और भविष्य के प्रति सुनहरी संकल्पना करता है यह आहत करने वाली स्थिति है। इस स्थिति के बनने के कारण लोगों को हर ओर दिखाई देते हैं। नागरिक का दैनंदिन साबका तो सरकारी व्यवस्थाओं से ही अधिक पड़ता है, और उसमें उसे अपने प्रति सम्मान या सद्भाव मिलना असंभव और असाध्य लगता है।
जब वह हर ओर कर्तव्य-बोध को अनुपस्थित पाता है, तब उसका अपना नागरिक- कर्तव्य बोध भी पीछे छूट जाता है। वह जानता है कि नदियों का प्रदूषण उसके लिए ही नहीं, भावी पीढ़ियों के लिए भी घातक है, लेकिन वह यमुना के पुल पर से पूजा की उपयोग हो चुकी सामग्री को फेंकने में कोई हिचक नहीं दिखाता है। यह किसका प्रभाव है?
वह समाचार पत्रों में पढ़ता है कि यमुना में पिछले डेढ़ वर्ष में बिना परिष्कृत सीवेज 19 फीसद बढ़ा है। सीवेज औसतन 10 फीसद प्रति वर्ष बढ़ता है लेकिन प्रतिष्करण की क्षमता केवल पांच फीसद बढ़ती है। अत: समस्या चिंताजनक से विकट स्तर तक पहुंच रही है। दिल्ली में कूड़े के पहाड़ और उसके आस-पास रहने वालों का जीवन कितना असह्य और कठिन होता जा रहा है यह तो वहां रहने वाले ही बता सकते है। सामान्य नागरिक के सरकारी अस्पतालों के अनुभव, कचहरी और पुलिस थाने के वातावरण, न्याय की सुषुप्त प्रक्रिया उसके उस आत्मबोध को धूमिल कर देती हैं जिससे उसके अंदर के कर्तव्यों का भान होना चाहिए था।
समाज में व्याप्त तनाव का फैलाव अनेक प्रकार की नकारात्मक प्रवत्तियों और नकारात्मकता को जन्म देता है और उसका प्रकटीकरण समय समय पर होता रहता है। लेकिन लोगों ने इसे अपनी नियति मान लिया है। राजनीति से प्रेरित- और प्रायोजित – विरोध प्रदर्शनों में सरकारी संपत्ति को तोड़ना फोड़ना, वाहन जलाना एक आवश्यक अंग बन गया है।
तनाव का बोझ जब सामान्य नागरिक पर लगातार बढ़ता रहता है तब किसी छोटी सी घटना से व्यक्ति के अंदर कितना भयावह विस्फोट हो सकता है जो हर किसी का दिल दहला दे। इंदौर के पास एक व्यक्ति घर लौटता है, एक आवारा कुत्ते के भौंकने पर क्रोधित हो जाता है और एक तलवार उठाकर उसे मारने दौड़ता है।
पत्नी रोकने का प्रयास करती है तो वह पत्नी की ही हत्या कर देता है। दो बच्चों को भी मार देता है और आत्महत्या कर लेता है। उसके दो छोटे बच्चे छत से कूदकर अपनी जान तो बचा सके लेकिन अनाथ हो जाते हैं। असहजता की स्थिति घरों और परिवारों में आवश्यक सहजता और पारिवारिक सद्भाव पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है।
जब जीवन अधिकांश के लिए असहज स्थिति में आता है, तब उसके मूल कारक – भ्रष्ट आचरण, अनैतिकता और जनकल्याण कोष का दुरुपयोग और भी तेजी से पनपता है। एक प्रचलित उदाहरण लेते हैं : वर्ष 2007-08 के प्रारंभ से ही केंद्र सरकार अल्पसंख्यक छात्रवृत्ति योजना के अंतर्गत सारी धनराशि उपलब्ध कराती रही है।
इसके वितरण की व्यवस्था और सही व्यक्ति को सही समय पर मिले इसका सत्यापन करने का उत्तरदायित्व राज्य सरकारों का होता है। जब-जब इसकी जांच होती है- आंखें खोलने वाले भ्रष्ट आचरण के आंकड़े सामने आते है। ऐसे ही एक सत्यापन में कक्षा 10 और 12 के दो लाख से अधिक के बच्चों के रोल नंबर एक से पाए गए।
एक अन्य जांच में 1572 मदरसों में से 53 फीसद यानी 830 फर्जी निकले। अब कल्पना कीजिए कितने बच्चों के नाम पर तंत्र के भ्रष्ट अधिकारियों ने अपनी तिजोरियां भरीं होंगी! ये वह लोग है जो समय-समय पर हर सरकार की अल्पसंख्यकों की शिक्षा पर ध्यान न देने की शिकायत करते रहते हैं और इसे राजनैतिक हथियार बनाते हैं।
अनसूचित जाति और जनजाति के लिए मिलने वाली छात्रवृत्तियों में भी करोड़ों रुपए के घोटाले होते रहते हैं। दुर्भाग्य यह है कि इस देश में कानून व्यवस्था इस स्थिति में पहुंच गई है कि न्याय मिलने में देरी कितनी होगी, इसका अनुमान पीड़ित व्यक्ति कभी नहीं लगा सकता है।यही स्थिति उन लोगों की भी है जो सिडिंकेट बना कर देश में राष्ट्रीय स्तर की व्यवसायिक प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं के पर्चे लीक करते हैं। हर लीक के कारण परीक्षा निरस्त होने पर कितने ही मासूम विद्यार्थी एवं उनके परिवार बर्बाद हो जाते है।
कोरोना महामारी के समय में देश ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम लोगों को नि:शुल्क राशन देने के लिए उठाया था। यह प्रकल्प विस्तार और विशालता में 80 करोड़ लोगों तक पहुंचा। इसे बड़ी सफलता माना जाना चाहिए, लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। गरीबी रेखा से लोग बाहर आ रहे है लेकिन देश में 80 करोड़ लोगों का अभी भी नि:शुल्क राशन पर निर्भर होना किसी भी तेजी से विकसित हो रहे देश के लिए सम्मानीय स्थिति तो कतई नहीं है।
विश्वपटल पर भारत की महत्त्वपूर्ण उपस्थिति को 21वीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक स्वीकार्यता मिली है। निश्चित ही इसमें राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ भारत के उन प्रतिभाशाली युवाओं का योगदान है जिन्होंने अपनी प्रतिभा, क्षमता, लगनशीलता और कर्मठता से अमेरिका और यूरोप में नाम कमाया। 23 अगस्त 2023 को भारत का चंद्रयान-3 जब चंद्रमा पर जिस बारीकी के साथ उतरा वह अद्भुत था। भारतीय मेधा की श्रेष्ठता का इससे अधिक सशक्त प्रमाण और क्या हो सकता है। यह भी स्वीकार करना होगा कि इस सब को प्रेरणा, संवर्धन और प्रोत्साहन भारत सरकार और उसके वर्तमान नेतृत्व से मिला, और मिलना ही चाहिए था।
देश में एकजुट होकर सफलता पाने के उदाहरण हर तरफ मिलते हैं। देशवासी यदि 1962, 1965, 1971 और 1999 के युद्धों के समय एकजुट हो सकते हैं तो आंतरिक नकारात्मकताओं के निर्मूलन के लिए क्यों इकट्ठे नहीं लड़ सकते हैं? एकजुटता में अब देश को देरी नहीं करनी चाहिए। राष्ट्र को वर्तमान संसदीय, न्यायिक और न्याय के क्रियान्वयन व्यवस्था पर सतर्क और समग्र दृष्टि डालना आवश्यक है। व्यवस्था समन्वय के नए तरीके अपनाने होंगे।
लाभार्थी के खाते में धनराशि का सीधे पहुंचना एक ऐसा सपना था जो आज साकार हो गया है। कितने ही उदाहरण दिये जा सकते है। इस सब में पूर्णरूपेण सफल होने के लिए हर स्तर पर जिस समन्वय की आवश्यकता है, वह राजनीति में संवादहीनता के बढ़ते चलन के कारण लगातार कम होता जा रहा है, और यह भी स्पष्ट होता जा रहा है कि दलगत राजनीति देश के संविधान की मूल आत्मा से दूर होती जा रही है।
भारत स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की अपनी उपलब्धियों पर गर्व कर सकता है मगर उसे उन चुनौतियों का भी सही परिमाण में आकलन कर समाधान निकालने का प्रयास- सामूहिक प्रयास- करना होगा जिससे सामान्य जन का जीवन और सुधर सके, उसे आत्म सम्मान का जीवन मिल सके।