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India

सुविधाओं की दृष्टि से अधिक विकसित शहरों में आत्महत्या की दर अधिक

Admin
Last updated: 2023/09/29 at 9:27 AM
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9 Min Read
Depression | suicide
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ज्योति सिडाना

यह हैरान करने वाली बात है कि जो शहर शिक्षा, प्रौद्योगिकी और अन्य सुविधाओं की दृष्टि से अधिक विकसित हैं, वहां आत्महत्या की दर अधिक है। क्या विकास प्रक्रियाओं और आत्महत्या के बीच कोई परस्पर संबंध है? आत्महत्या की प्रवृत्ति का अध्ययन करने के लिए जनसंख्या को तीन समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

एक तरफ ऐसा समूह है, जो उच्च श्रेणी के पेशों और व्यवसायों से जुड़ा है, उच्च शिक्षा प्राप्त और विशेषज्ञता रखता है। मसलन, चिकित्सक, प्रबंधक और इंजीनियर आदि। दूसरी तरफ ऐसा समूह है, जो उच्च शिक्षा प्राप्त तो है, पर मध्यम श्रेणी के पेशों से संबद्ध है। जैसे शिक्षक, दुकानदार और व्यावसायी आदि। तीसरा वह समूह है, जो कम शिक्षित और निम्न श्रेणी की विशेषज्ञता वाले लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जैसे किसान, मजदूर और छात्र आदि।

पहले समूह में तनाव, अकेलापन, कार्य के अधिक घंटे, परिवेश के साथ कुसमायोजन, विचारों और भावनाओं की साझेदारी का अभाव, असीमित अकांक्षाएं और विफलता इन्हें आत्महत्या की ओर प्रेरित करती है। नितांत व्यक्तिवादी होने के कारण ये लोग अपनी विफलता, उपलब्धियों और निराशा को खुद ही व्यवस्थित करने की कोशिश करते हैं।

यह समूह प्रौद्योगिकी का अत्यधिक प्रयोग करने के कारण ‘आभासी समाज’ के संपर्क में अधिक रहता है, जिसका यथार्थ जीवन से कोई संबंध नहीं रहता। इस प्रवृत्ति ने मनुष्य को सामूहिकता से व्यक्तिवादिता की ओर अग्रसर किया है। समाजशास्त्री दुरखाइम ने भी अपनी पुस्तक ‘सुसाइड’ में यह तर्क प्रस्तुत किया कि जैसे-जैसे समाज सरल से जटिल समाज की ओर अग्रसर हुआ, सामूहिकता का स्थान व्यक्तिवादिता ने ले लिया।

नतीजतन, व्यक्ति आत्मकेंद्रित बन कर रह गया है और सामाजिक संबंधों से कट गया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि मनुष्य अब किसी भी प्रकार के साझेपन से दूर और जीवन में उत्पन्न अनेक प्रकार के तनावों तथा समस्याओं को अकेले ही झेलने को बाध्य है, जो उसे कभी-कभी जीवन की समाप्ति के लिए उकसाता है।

दूसरे समूह के लोगों में आत्मविश्वास की कमी होती है, क्योंकि उनके ज्ञान और सूचना का विश्व अधूरा होता है। उचित वेतन का अभाव तथा अस्थायी चरित्र का रोजगार इनमें असुरक्षा और भय उत्पन्न करता है, जिसके कारण ये लोग आत्महत्या की ओर अग्रसर होते हैं। आज के उपभोक्तावादी समाज ने न केवल धनवान होने की आकांक्षा को बल दिया है, बल्कि मंहगी कारें, नामी वस्तुएं, नामी कपडे और पांच सितारा जीवन शैली को अपने जीवन का अंग बनाने वाली जनसंख्या का विस्तार किया है।

जहां मीडिया और बाजार के माध्यम से सफलता भी एक उपभोक्ता वस्तु बन गई है। उसे मनुष्य किसी भी कीमत पर पाना चाहता है और जब पाने में विफल हो जाता है तो जीवन से पलायन करने का प्रयास करता है, क्योंकि अब उसे अपना जीवन अर्थहीन लगने लगता है।

तीसरा समूह, जो आर्थिक विपन्नता के कारण ऋणग्रस्तता का शिकार रहता है, जो अस्थिर प्रकृति के व्यवसायों में संलग्न है, आधुनिक प्रौद्योगिकी के ज्ञान से वंचित है, पर जिसे सामूहिक उत्तरदायित्वों का बोध है और जिनका निर्वाह न कर पाने की स्थिति इन्हें आत्महत्या की ओर अग्रसर करती है। कहा जा सकता है कि तकनीकी निर्देशित आर्थिक विकास ने किसानों, अकुशल श्रमिकों और परंपरागत शिक्षा प्राप्त छात्रों के सामने विकल्पहीनता की स्थिति उत्पन्न की है, जिसके कारण वे खुद को गलाकाट प्रतियोगिता का हिस्सा बनाने में असमर्थ अनुभव करते हैं।

क्योंकि वैश्वीकरण ने नव-उदारवाद पर बल देकर एक ऐसी प्रक्रिया को उत्पन्न किया है, जिससे असमानता की खाई और चौड़ी तथा निर्धनता, बेकारी, असमान विकास में वृद्धि कर रही है। परिणामस्वरूप इस समूह में उत्पन्न हताशा, गुस्सा और आक्रामकता, हत्या या आत्महत्या के प्रयासों को जन्म देती है।

इन तीनों समूहों के समाजशास्त्रीय विश्लेषण से स्पष्ट है कि नव-उदारवाद ने वर्तमान समाज-व्यवस्था की सभी श्रेणियों को शोषणमूलक बनाया है। इस व्यवस्था ने पहली श्रेणी को सफलता प्राप्ति की अंधी प्रतियोगिता में झोंक दिया है। जहां सफलता प्राप्ति की कोई सीमा नहीं है, पर विफलता उसे आत्महत्या की तरफ ले जाती है। पिछले कुछ वर्षों में आइआइटी और मेडिकल छात्रों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति इसका उदाहरण है।

दूसरी श्रेणी को इस व्यवस्था ने इतना असुरक्षित बना दिया है कि वे अपनी अकांक्षाओं को पूरा नहीं कर पाते और निराशा का शिकार हो जाते हैं। अस्थायी पेशों और व्यवसायों से जुड़े लोगों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या इसका उदाहरण है। जबकि तीसरी श्रेणी के पास कोई विकल्प ही नहीं बचता है। वह सफलता की आस में अपना सब कुछ दांव पर लगा देता और विफलता मिलने पर आत्महत्या कर लेता है।

तर्क दिया जा सकता है कि शिक्षा ने तीनों समूहों को संघर्ष करने की क्षमता से बाहर कर दिया है, जबकि शिक्षा का मुख्य लक्ष्य आलोचनात्मक चेतना के साथ संघर्ष से सफलता और सफलता के लिए संघर्ष का जज्बा पैदा करना है। अब परिवार भी समाजीकरण का प्रभावी साधन नहीं रहा, जिससे बच्चों और युवाओं में अहंकार और असहनशीलता में वृद्धि हुई है। बच्चे परिवार की प्रतिष्ठा केंद्रित प्रतियोगिता का भी हिस्सा बने हैं, यानी बच्चों की सफलता-विफलता परिवार की प्रतिष्ठा का निर्धारक बनी है। अब राज्य भी इन सभी समस्याओं का उपयुक्त समाधान दे पाने में सक्षम नहीं है, इसलिए राज्य का कल्याणकारी चरित्र हाशिए पर जा रहा है।

फलस्वरूप तीनों ही प्रकार के समूह विद्यमान सामाजिक व्यवस्था और आधुनिकता की तीव्र दर के मध्य समायोजन न कर पाने के कारण जोखिम वाले समाज का हिस्सा बने हैं। सफलता की अंधी दौड़ में भाग रहे लोग नैराश्य, कुंठा, तनाव, आक्रामकता, झुंझलाहट और हिंसक वृत्ति का शिकार होकर स्वयं को मार रहे हैं। इस प्रवृत्ति को अगर नहीं रोका गया तो आने वाला समय कितना भयावह होगा, कहना कठिन है।

शिक्षा बच्चों को स्थानीयता से सार्वभौमिकता की प्रक्रिया का अंग बनाकर उनके दृष्टिकोण को विस्तृत बनाती है। उन्हें सभी प्रकार की दासता और भय से मुक्त करती तथा स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने वाली इकाई बनाती है। मगर क्या वास्तव में आधुनिक शिक्षा अपनी इस भूमिका का निर्वाह कर रही है या बच्चों को समाज का सक्रिय सदस्य बना रही है। संभवत: परिवार, समाज और शिक्षण संस्थान अपनी यह भूमिका ईमानदारी से नहीं निभा पा रहे हैं।

इसलिए पिछले नौ महीनों में कोटा में छात्रों की आत्महत्या की छब्बीस घटनाएं सामने आई हैं। ऐसी घटनाओं से यही लगता है कि बच्चों का व्यक्तित्व इतना कमजोर है कि जीवन में थोड़ा-सा तनाव या मानसिक परेशानी उन्हें आत्महत्या को बाध्य कर देती है। शिक्षण संस्थान एक लाभ केंद्रित उद्योग में परिवर्तित हो चुके हैं। कहते हैं कि शिक्षा वह नींव है जिस पर हम अपने आने वाले कल का निर्माण करते हैं। यह कैसी नींव है, जो बच्चों के भविष्य को अंधकार में धकेल रही है, उनमें निराशा, कुंठा, हीन भावना, अकेलापन और पलायन की भावना उत्पन्न कर रही है।

अगर शिक्षा बच्चों में आलोचनात्मक चेतना और तार्किक विश्लेषण की क्षमता उत्पन्न नहीं कर पा रही है, तो वह अर्थहीन और उद्देश्यहीन है। इसके बिना शिक्षा बच्चों में ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, भय, हीनभावना और हार का डर पैदा करती है। ऐसे बच्चे ही बिना सोचे-समझे आत्महत्या जैसे कठोर कदम उठा लेते हैं। कौशल विकास के नाम पर उन्हें केवल तकनीकी और प्रबंधन विषय का ज्ञान देना उनके मानवीय गुणों को समाप्त कर उन्हें मशीन में बदल रहा है, इसलिए इस नकारात्मक और पलायनवादी प्रवृत्ति को रोकने के लिए प्रारंभिक कक्षाओं से ही शुरुआत करनी होगी।

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