उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध जिम कार्बेट पार्क और राजाजी राष्ट्रीय उद्यान हाथियों को सबसे ज्यादा पसंद है और यहां पर बड़ी तादाद में हाथी पाए जाते हैं। यह दोनों उद्यान एशिया में हाथियों के लिए सबसे ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं, परंतु कुछ सालों में इन दोनों उद्यानों में हाथियों की मौत का सिलसिला तेजी से बढ़ा है।
राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के बीच में से होकर रेल गुजरती है और यह रेल हाथियों के लिए सबसे बड़ी जान की जोखिम बनी हुई है। राज्य में रेल से कटकर हाथियों की मौत का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। पिछले दिनों हरिद्वार लक्सर रेल पटरी पर करते हुए रेल की चपेट में आने से हाथी की मौत हो गई जिसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि कब तक हाथी ट्रेन से कट कर मरते रहेंगे।
उत्तराखंड बने हुए 23 साल हो गए हैं और इस दौरान जंगलों में 508 हाथियों की मौत विभिन्न वजहों से हुई है, जिनमें से 23 हाथी रेल से कट कर मौत के शिकार हुए हैं। अकेले 16 हाथी राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के बीच से होकर गुजरने वाली देहरादून-हरिद्वार-देहरादून रेल पटरी को पार करते हुए रेल की चपेट में आने से मरे हैं।
जो 16 हाथी रेल की चपेट में आकर मरे हैं, उनमें ज्यादातर की मौत गढ़वाल मंडल में हुई है । गढ़वाल मंडल के हरिद्वार जनपद के सीतापुर रेलवे फाटक के पास रेल पटरी को पार करते हुए 13 जनवरी 2013 को एक साथ दो हाथियों की मौत हुई थी। 17 फरवरी 2018 तथा 20 मार्च 2018 को नंदा देवी एक्सप्रेस रेल की चपेट में आने से दो हाथियों की मौत हुई थी।
26 जून 2018 को काठगोदाम एक्सप्रेस की चपेट में आने से एक हाथी की मौत हुई थी। 19 अप्रैल 2019 को हरिद्वार के सीतापुर रेलवे फाटक पर रेलवे पटरी पार करते हुए दो टस्कर हाथियों की मौत हो गई थी और अब 18 सितंबर 2023 को हरिद्वार के सीतापुर रेलवे फाटक पर पटरी पार करते हुए रेल की चपेट में आने से एक हाथी की मौत हो गई।
प्राकृतिक आपदा से 184 हाथी मरे
वैसे उत्तराखंड के जंगलों में हाथियों की प्राकृतिक मौत का आंकड़ा दुर्घटनाओं से ज्यादा है। 2001 से लेकर अब तक 184 हाथी प्राकृतिक कारणों से मरे हैं और बाकी हाथी या तो रेल से कट कर मरे हैं या फिर हाथी आपसी द्वंद के कारण मौत का शिकार हुए हैं।
हाथी मानव संघर्ष में बढ़ोतरी
दरअसल उत्तराखंड के जंगलों में हाथियों की बढ़ती तादाद के बाद चारे की कमी हो गई है जिस कारण हाथी जंगल से निकलकर गांवों की ओर आते हैं। खासकर धान और गन्ने की फसल के दौरान हाथी खेतों की तरफ कूच करते हैं और फसलों को तहस-नहस कर देते हैं और इस दौरान जो भी किसान या अन्य व्यक्ति उनके सामने आता है वह उसे मौत की घाट उतार देते हैं।
इस तरह हाथियों और मानव के बीच उत्तराखंड में संघर्ष की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं। उत्तराखंड के देहरादून जनपद के रायवाला, डोईवाला, हरिद्वार जनपद के लक्सर पट्टी के गांव जगजीतपुर, मिसरपुर, जियापोता, नूरपुर पंजन हेड़ी, सुल्तानपुर और कुमाऊं मंडल के उधम सिंह नगर और नैनीताल जिले के तराई वाले क्षेत्रों में जंगली हाथियों का जबरदस्त आतंक है। वन विभाग के खिलाफ कई बार स्थानीय जनता ने प्रदर्शन भी किए हैं और वन विभाग ने जंगली हाथियों को रोकने के लिए कई उपाय भी किए हैं जो नाकाफी साबित हुए हैं।
उत्तराखंड में हाथियों की तादाद बढ़ी
उत्तराखंड में इस समय हाथियों की तादाद सवा दो हजार से ज्यादा है । वयस्क नर और मादा हाथी का लैंगिक अनुपात 1:2.50 पाया गया है जो एशियाई हाथियों की आबादी में बेहतर माना गया है। उत्तराखंड के जंगलों में 2012 में 1,559, 2015 में 1797 और 2017 में 1,839 और 2020 में 2026 हाथियों की तादाद थी। उत्तराखंड में 2017 से हाथियों की तादाद में 10.17 फीसद की बढ़ोतरी हुई है।
विश्व हाथी दिवस
हाथियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए हर साल 12 अगस्त को विश्व स्तर पर विश्व हाथी दिवस मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य हाथियों से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों के बारे में जन जागरूकता बढ़ाना है।विश्व हाथी दिवस अभियान की शुरुआत 2012 में हुई थी। उत्तराखंड के वन मंत्री सुबोध उनियाल का कहना है कि वन महकमा जंगली हाथियों को शहरों और गांवों में जाने से रोकने के लिए युद्ध स्तर पर कई प्रयास कर रहा है जिसके कारण आने वाले समय में जंगली हाथियों के शहरों और गांवों में जाने की घटनाओं में कमी आएगी।
उत्तराखंड के मुख्य वन्य जीव प्रतिपालक डाक्टर समीर सिंह कहते हैं कि रेल पटरी पर हाथियों के काटने की घटनाओं को रोकने के लिए कई स्तर पर विभिन्न सालों में कई प्रयास किए गए हैं। हरिद्वार देहरादून रेल मार्ग में रेलों की गति को काम करने का भी नियम बनाया गया है परंतु कई बार रेल विभाग रेल की निर्धारित गति कायम नहीं रखा पाया है और तेज गति से आई रेल की चपेट में आने से हाथी मौत का शिकार हो जाते हैं।