दिल्ली स्थित जंतर-मंतर वेधशाला को अब नया रूप रंग मिलेगा। इसके साथ ही वहां पर कई तरह की नई व्यवस्थाएं की जाएंगी। इसमें सुविधाएं बढ़ाने से लेकर उसकी साज-सज्जा तक की योजना शामिल है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इसका पूरा खाका तैयार कर लिया है।
जंतर-मंतर एक वेधशाला है जिसे जयपुर के महाराजा जयसिंह- द्वितीय ने बनवाया था। यह एक खगोलीय स्थल है, जहां पर उससे संबंधित यंत्र लगे हैं और उसे खगोलीय जानकारी मिलती है। ईंट की रोड़ी से निर्मित और चूने का पलस्तर चढ़े इन उपकरणों की बार-बार मरम्मत की गई लेकिन बड़े पैमाने पर इसमें परिवर्तन नहीं किया गया। इनमें से सम्राट यंत्र (सुप्रीम उपकरण) एक विषुवीय डायल है जिसमें पृथ्वी के अक्ष के समानान्तर कर्ण सहित त्रिकोणीय शंकु बने हैं और शंकु के दोनों तरफ वृत्तपाद बने हुए हैं जो विषुवत् रेखा के समानांतर हैं। इसके दक्षिण में जयप्रकाश में दो नतोदर अर्धगोल संरचनाएं हैं जिनसे सूर्य और अन्य खगोलीय पिन्डों की स्थिति का पता लगाया जाता है।
एएसआई की योजना के मुताबिक यहां एक नया गेट लगाया जाएगा और एंट्री एरिया को नया स्वरूप दिया जाएगा। पूरा परिसर को बेहद खूबसूरत बनाया जाएगा। कोलोनियल बैरक को फिर से बनाया जाएगा। एक इंटरप्रिटेशन सेंटर की भी स्थापना की जाएगी। इससे यहां आने वाले लोगों को वेधशाला में विभिन्न उपकरणों को समझने में मदद मिलेगी। इंटरप्रिटेशन सेंटर में सभी दस्तावेजों का डिजिटलाइजेशन होगा और उनकी तस्वीरें भी लगाई जाएंगी। काउंटर पर जंतर-मंतर के बारे में जानकारी देने वाली किताबें भी रखी जाएंगी।
परिसर के बाहर राम यंत्र की तस्वीरें उकेरी जाएगी। बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए शिशु देखभाल कक्ष भी बनेगा। पूरी वेधशाला को आकर्षक लाइटिंग से सजाया जाएगा। इसमें 13 वास्तुशिल्प खगोल विज्ञान उपकरण शामिल हैं। वेधशाला आधुनिक वास्तुकला के समान दिखने वाले ज्यामितीय उपकरणों से बनी है। ये समय मापने, ग्रहण की भविष्यवाणी करने, तारों पर नजर रखने के लिए है।
एएसआई ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा था वेधशाला की सुरक्षा, संरक्षण, मरम्मत और उचित कामकाज के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई गई है। इस पैनल के सदस्यों ने जुलाई में एक बैठक कर वेधशाला के संरक्षण की जरूरत पर जोर दिया था। पैनल ने यह भी सुझाव दिया था कि सभी संरचनाओं का व्यापक दस्तावेजीकरण कराया जाए।