विनोद के शाह
एक रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी से मार्च 2023 की तीन माह की अवधि में देश के इक्कीस लाख बैंक खातों से डेटा चोरी हुआ। देश के बैंकों पर साइबर हमलों की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। बावजूद इसके, बैंक साइबर सुरक्षा पर निवेश नहीं कर पा रहे हैं। केंद्र सरकार ने ‘डिजिटल सुरक्षा अधिनियम 2023’ के माध्यम से डेटा सुरक्षित करने का एलान जरूर किया है, लेकिन इसमें अनेक विसंगतियां हैं।
पिछले तीन वर्षों में देश के बैंकिग आर्थिक साइबर अपराधों में करीब तीन गुना वृद्धि हुई है, जबकि इस अवधि में ठगी गई रकम की मात्रा में पांच गुना बढ़ोतरी हो चुकी है। वर्ष 2021 में देश में दर्ज साइबर ठगी के मामलों की संख्या 7.05 लाख थी, जो मार्च 2023 तक 19.94 लाख पर पहुंच चुकी है। इस अवधि में ठगी गई राशि वर्ष 2021 के 542.7 करोड़ रुपए के मुकाबले मार्च 2023 में 2537.35 करोड़ रुपए को पार कर चुकी है।
साइबर अपराधों में उपभोक्ता हितों की रक्षा के लिए गठित संसदीय समति ने भारतीय रिजर्व बैंक से सिफारिश की है कि वह पीड़ित ग्राहकों को मुआवजा देने का सरल प्रावधान बनाए। डिजिटल वित्तीय व्यवस्था को अधिक सुरक्षित बनाने के लिए साइबर सुरक्षा प्राधिकार की स्थापना, फोन पर कर्ज देने वाली वित्तीय समितियों और काली सूची में शामिल लोन एजंसियों की सूची का अलग-अलग सार्वजनिक प्रकाशन करने की सिफारिश भी संसदीय समिति ने आरबीआइ से की है।
वर्ष 2022-23 में बैंकों ने 8.5 करोड़ नए क्रेडिट कार्ड जारी किए हैं, जिससे क्रेडिट कार्ड से व्यापार में 42 फीसद की वृद्धि दर्ज हुई है। बैंकों की आय में भी जबरदस्त उछाल आया है। मगर इसके विपरीत क्रेडिट कार्ड से होने वाली ठगी पर रोक लगाने के उपाय खोजने में बैंक विफल साबित हो रहे हैं। राज्यसभा में केंद्रीय वित्तमंत्री ने स्वीकार किया कि एक साल में क्रेडिट कार्ड का एनपीए 28 फीसद की दर से बढ़ कर 2.10 लाख करोड़ रुपए का हो चुका है।
बैंक अधिक कमाई और ब्याज वसूली के लिए अधिक से अधिक क्रेडिट कार्ड ग्राहक बनाने के मिशन में जुटे हैं, मगर क्रेडिट कार्ड को अपराधियों से सुरक्षित बनाने में गंभीर नही हैं। हाल में देश के राष्ट्रीयकृत बैंक आफ बड़ौदा में मप्र और दिल्ली के उन ग्राहकों के साथ बड़ी संख्या में धोखाधड़ी हुई, जो डिजिटल सेवा से जुड़े नहीं थे। शिकार ग्राहकों ने न कभी बैंक से एटीएम लिया, न ही ओटीपी साझा किया था। ग्राहकों से अनुमति लिए बगैर बैंक ने सभी ग्राहक खातों को बैंक के एक ऐप से जोड़ दिया था, जो ग्राहकों की ठगी का कारण बना। बैंक की गलती के बावजूद पीड़ित ग्राहकों के खाते में राशि नहीं लौटाई गई है।
बैंकिंग विनिमय में यूपीआइ को सुरक्षित बताकर अधिक लोकप्रिय बनाया जा रहा है। छिहत्तर फीसद लेनदेन अब यूपीआइ के माध्यम से होने लगा है। मगर इस सेवा में ग्राहक हित सुरक्षा को शून्य रखा गया है। सेवा का उपयोग करने वाला व्यक्ति भारतीय उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत क्षति प्राप्ति के दायरे में नहीं आता है। वह अपनी क्षतिपूर्ति का प्रकरण उपभोक्ता विवाद आयोग में पेश करने की पात्रता नहीं रखता है।
क्योंकि सेवाग्राहिता सेवा के बदले वह सेवा प्रदाता कंपनी को किसी राशि का भुगतान नहीं करता है। इसलिए उपभोक्ता आयोग उसे ग्राहक नहीं मानता। भारतीय रिजर्व बैंक ने 2022 में यूपीआइ से होने वाले लेनदेन पर कंपनियों को सेवाकर लेने की सिफारिश केंद्र सरकार से इसी वजह से की थी। मगर सरकार ने विपक्ष और जनता के संभावित विरोध के डर से इस व्यवस्था को कानूनी जामा पहनाने से किनारा कर लिया था।
आरबीआइ, बैंकों और लघु वित्तीय कंपनियों में ग्राहक डेटा सुरक्षा की नियमित निगरानी करने में विफल रहा है। ग्राहकों के सबसे अधिक डेटा चोरी बैंकों और बीमा कंपनियों के असुरक्षित भंडारण और कर्मचारियों की मिलीभगत से संभव हो पा रहे हैं। ‘केवाइसी’ कराने के नाम पर बैंक, बीमा कंपनियां, मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियां, शिक्षा और कोचिंग संस्थान समय-समय पर अपने ग्राहकों से ‘केवाइसी’ दस्तावेज लेने के बाद उनका सुरक्षित भंडारण और निष्पादन नहीं करते हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार जनवरी से मार्च 2023 की तीन माह की अवधि में देश के इक्कीस लाख बैंक खातों से डेटा चोरी हुआ। देश के बैंकों पर साइबर हमलों की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। बावजूद इसके, बैंक साइबर सुरक्षा पर निवेश नहीं कर पा रहे हैं। केंद्र सरकार ने ‘डिजिटल सुरक्षा अधिनियम 2023’ के माध्यम से डेटा सुरक्षित करने का एलान जरूर किया है, लेकिन इसमें अनेक विसंगतियां हैं।
देश में नकली वेबसाइटें, मोबाइल ऐप, मोबाइल गेम और लोन ऐप सिर्फ आर्थिक ठगी नहीं, इंसानी जिदंगियों को मौत में बदलने और धर्मांतरण जैसी आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होते जा रहे हैं। मोबाइल गेम के कारण देश के सैकड़ों किशोर आत्महत्या कर चुके हैं, हजारों का मानसिक संतुलन बिगड़ चुका है। मगर केंद्र सरकार इसे रोकने के लिए सिर्फ पैसे से जुड़े गेम पर जीएसटी की दर को 18 फीसद से बढ़ा कर 28 फीसद कर इस जानलेवा आपराधिक गतिविधि को नियंत्रित करने का उपाय खोज रही है।
इन कंपनियों पर पहले से ही 58 हजार करोड़ रुपए का आयकर और 30 हजार करोड़ रुपए का जीएसटी बकाया है। संगठित गेमिंग कंपनियां जोर-शोर से इसे भारत की चालीस करोड़ जनता को मनोरंजन देने वाली औद्योगिक इकाई बता कर केंद्र की स्टार्टअप योजना में संरक्षण पाने का दावा भी कर रही हैं।
संविधान की सातवीं अनुसूची में जुआ, सट्टा, लाटरी और आनलाइन गेम को राज्य का विषय बताकर उसे नियंत्रित करने की व्यवस्था राज्य पुलिस के अधीन की गई है। अपराधी आनलाइन लाटरी, मोबाइल गेम को अंतरराष्ट्रीय और अंतरराज्यीय स्थलों से संचालित कर रहे हैं, जहां राज्य पुलिस की आसान पहुंच ही संभव नहीं होती है।
पूरे देश में ‘साइबर ब्लैकमेलिंग’, हत्या और आत्महत्या के सैकड़ों किस्से एक ही प्रकार से हैं, जिनका मूल आनलाइन कर्ज, गेम और लाटरी से जुड़ा है। पहले मोबाइल के माध्यम से ऋण उपलब्ध कराया जाता है, जो बगैर किसी दस्तावेज के नब्बे दिन की अवधि के लिए होता है। आम नागरिक इसे सरल प्रक्रिया मानकर आसानी से ले तो लेता है, लेकिन ऋण ऐप को डाउनलोड करते ही ग्राहक के मोबाइल में उपलब्ध सभी निजी डेटा ऋण प्रदाता को उपलब्ध हो जाते हैं।
साइबर अपराधी इतने शातिर और अत्याधुनिक तकनीक से लैस हैं कि राज्यों की पुलिस पांच फीसद आरोपियों की गिरेबान तक भी नहीं पहुंच पा रही है। वैश्विक अपराध से निपटने में सक्षम होने का दावा करने वाली राज्य सरकारों के पास साइबर अपराध से निपटने के तकनीकी संसाधन ही नहीं हैं। देश के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इक्कीस राज्य ऐसे हैं, जहां संपूर्ण राज्य में बमुश्किल एक से दो साइबर पुलिस थाने हैं।
मध्यप्रदेश, बिहार, राजस्थान, पंजाब, असम उस सूची में शामिल हैं जहां पूरे राज्य में साइबर अपराधों की विवेचना के लिए एकमात्र साइबर थाना स्थापित है। देश के नौ राज्यों- हरियाणा के मेवात, भिवानी, नूंह, पलवल, मनोटा, हसनपुर, हथन; झारखंड के जामताडा, देवघर; पश्चिम बंगाल के आसनसोल, दुर्गापुर; आंध्रप्रदेश के चित्तूर, गुजरात के अहमदाबाद, सूरत; उप्र का आजमगढ़; असम के बारपेटा, धुबरी; बिहार के बांका, नालंदा, गया और दिल्ली के ओखला, शकरपुर, उत्तम नगर पूरे विश्व में साइबर अपराधियो के अड्डों के नाम से कुख्यात हो चुके हैं। मगर इन राज्यो की पुलिस के पास इन अड्डों की आपराधिक जानकारी भी उपलब्ध नहीं है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर केंद्र सरकार ने 2020-21 में चीन से संचालित होने वाले डेढ़ सौ मोबाइल ऐप पर रोक लगाई थी। मगर उनमें से अधिकांश ऐप फिर नाम बदल कर संचालित हो रहे हैं। देश में साइबर अपराधी राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती दे रहे हैं, मगर देश अब भी संविधान की सातवीं अनुसूची का हवाला देकर राज्यों की पुलिस से अपराध को खत्म करने की अपेक्षा कर रहा है।