फॉर्मूले के बजाय आकलन के आधार पर हो एनपीए प्रावधान

एनबीएफसी क्षेत्र में नकदी संकट से लेकर आर्थिक मंदी में पिछले एक साल के दौरान श्रेय इन्फ्रास्ट्रक्चर ने कई परेशानी का सामना किया। श्रेय इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस लिमिटेड के वाइस चेयरमैन सुनील कनोडिय़ा ने ईशिता आयान दत्त व नम्रता आचार्य को दिए साक्षात्कार में बैंकिंग क्षेत्र में हुए सुधार मसलन समय के आधार पर एनपीए के प्रावधान को खत्म करना और लेनदार व देनदार के संबंधों को गोपनीय रखने जैसे मसलों पर विस्तार से बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश…

इस साल के आम बजट से आपकी क्या उम्मीदें हैं?

हमें सरकारी खर्च बढ़ाना होगा ताकि पूंजी निर्माण और आर्थिक रफ्तार बहाल हो। मध्यम से लंबी अवधि के लिहाज से भारत की प्रगति की कहानी अभी भी अक्षुण्न है। ऐसे में अभी भी विदेशी निवेश होगा, लेकिन यह कुछ निश्चित क्षेत्रों तक सीमित होगा। सरकारी खर्च की भूमिका अहम होगी, जिसके चलते पूंजी निर्माण होगा और यह निवेश लागएगा व भारत की आर्थिक रफ्तार को बहाल करेगा। इस साल के बजट में सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।

क्या देश के वित्तीय सेवा क्षेत्र की परेशानी खत्म हो गई?

मुझे लगता है कि भारत की वित्तीय स्थिति की समस्या के समाधान के लिए टुकड़ों में उठाए गए कदम कारगर नहीं हुए हैं। वित्तीय क्षेत्र अर्थव्यवस्था के लिए अहम होता है। भारत में डेवलपमेंट फाइनैंशियल इंस्टिट््यूशन बनाने की तत्काल जरूरत है। मजबूत क्षमता व प्रबंधन टीम के साथ यह संस्थान लंबी अवधि यानी 20-25 साल के लिए अर्थव्यवस्था को फंडिंग का सहारा दे। दुनिया के करीब-करीब सभी देशों में ऐसे संस्थान हैं, जिसका स्वामित्व सरकार के पास है। भारत में ऐसे संस्थान की दरकार है।

गैर-निष्पादित आस्तियों की स्थिति पर आपकी क्या राय है?

हम जिस तरह से एनपीए को पारिभाषित करते हैं उसकी समीक्षा होनी चाहिए। वैश्विक स्तर पर चाहे अमेरिका हो या यूरोप, बैंकों को नियामक नहीं बताते हैं कि उनका प्रावधान डिफॉल्ट के पहले दिन, 60 दिन, 90 दिन या 180 दिन के आधार पर होना चाहिए। लेनदारों को प्रावधान से पहले परिसंपत्ति/प्रतिभूतियों के अलावा भविष्य के नकदी प्रवाह का आकलन करना चाहिए। हमें ऐसे वैश्विक चलन को भारत में लाना चाहिए। किसी फॉर्मूले के आधार पर प्रावधान नहीं होना चाहिए, इसके बजाय यह आकलन पर आधारित होना चाहिए। साथ ही वैश्विक बैंकों को डिफॉल्टर के नामों का खुलासा करने की अनुमति नहीं है। अगर नाम का खुलासा हो जाता है तो देनदार ने एक ही दिन के डिफॉल्ट क्यों न किया हो, कोई बैंक उसे लोन की पेशकश नहीं करेगा। यह कुछ उसी तरह का मामला है कि किसी व्यक्ति को सर्दी लगी हो और आप उसे वेंटिलेटर पर रख देते हैं। लेनदार व देनदार का संबंध गोपनीय मामला है। हमने ये सिफारिशें एसोचैम के माध्यम से की है।

क्या भविष्य में एनपीए से संबंधित और झटका लग सकता है?

कीमत के लिहाज से एनपीए की ज्यादातर समस्या का समाधान हो गया है। लेकिन एमएसएमई क्षेत्र को पिछले कुछ सालों में काफी रकम मिली है और वहां एनपीए से संबंधित समस्या हो सकती है। इसकी वजह यह है कि किसी अर्थव्यवस्था में छोटी व मझोली कंपनियों का अस्तित्व काफी हद तक बड़े कॉरपोरेट पर निर्भर करता है। ऐसे में कीमत के लिहाज से हम हालांकि एनपीए में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं देख रहे हैं, लेकिन एमएसएमई क्षेत्र में दबाव के कारण एनपीए खाते की संख्या ज्यादा हो सकती है। मुझे लगता है कि एमएसएमई क्षेत्र में एनपीए अनुपात दो अंकों में रहेगा।

इस साल दिवालिया संहिता कितनी कामयाब होती दिख रही है?

यह सुनिश्चित करने में न्यायपालिका अहम भूमिका निभाता है कि परिसंपत्ति प्रदर्शन करे और कानूनी प्रक्रिया तेजी से पूरी हो। कानून का मकसद कारोबार की बहाली है, न कि कानूनी अड़चन पैदा करना। साथ ही मैं धारा 29 (ए) के हक में नहीं हूं। आप किसी उद्यमी को खुद की परिसंपत्तियों के लिए बोली लगाने से रोक नहीं सकते जबतक कि वह धोखेबाज न हो। अगर वह धोखेबाज हो तो आप उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू कर सकते हैं। लेकिन लेनदारों की समिति के पास यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि किसी उद्यमी को खुद की परिसंपत्तियों के लिए बोली लगाने की अनुमति दी जाए या नहीं।

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