यूएस की तरह हमारा ट्रांसपोर्ट सेक्टर भी डेवलप हो

कुछ दिन पहले एक न्यूज चैनल पर ट्रक ट्रांसपोर्ट का लेकर एक रिपोर्ट दिखाई जा रही थी । करीब एक घंटे की रिपोर्ट थी । फर्क बताया जा रहा था अमेरिकन ट्रांसपोर्ट और हमारे देश के ट्रांसपोर्ट सेक्टर व ट्रकों के हाल का । यूएस में ट्रक ड्राइवर व मालिक आत्मा सिंह ने बताया कि कैसे यूएस गवर्नमेंट उनके लिए हर तरह की सुविधाएं मुहैया करवाती है । यही नहीं उनकी परेशानी और सहूलियतों का भी पूरा ख्याल रखा जाता है । सबसे खास बात ये कि वहां पर ट्रक ड्राइविंग एक सम्मानित नौकरी है । किसी भी इंडस्ट्री की तरह ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री के लिए भी हर साल बजट में घोषणाएं होती हैं । जरूरत के हिसाब से उन्हें बजट में सपोर्ट भी दिया जाता है । आत्मा सिंह के पास अपना ट्रैक्टर ट्रेलर है, जिसे वे खुद ही ड्राइव भी करते हैं । औसतन हर महीने वे ढाई लाख रुपए कमा लेते हैं । वहीं अब बात करें हम अपने ‘देसी’ ट्रांसपोर्ट सिस्टम की तो कहां यूएस और कहां हम । हमारे यहां सहूलियतें देना तो दूर, अगर ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री में सुधार होता दिखता है तो कई तरह की बंदिशें और लगा दी जाती हैं या टैक्स का बोझ बढ़ा दिया जाता है । कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि सरकार इस इंडस्ट्री को उबरने ही नहीं देना चाहती । बजट में घोषणा करना तो दूर की कौड़ी है । अमेरिका में एक ड्राइवर रोज औसतन 10 घंटे गाड़ी चला सकता है । वहां नियम बंधे हुए हैं । ड्राइवर के लिए आराम करना जरूरी है ताकि सड़क पर सेफ्टी बनी रहे ।
जबकि भारत में ट्रक ड्राइवर 15-18 घंटे ड्राइविंग करते हैं और उन्हें सप्ताह में कोई छुट्टी भी नहीं मिलती । जबकि अमेरिका में सप्ताह में कम से कम 34 घंटे की छुट्टी ट्रक ड्राइवर के लिए अनिवार्य है । इसके अलावा वहां की गाड़ियां फुली आॅटोमैटिक हैं । एयर कंडीशन केबिन हैं व सोने के लिए अच्छा-खासा स्पेस जबकि हमारे यहां की गाड़ियों में एयर कंडीशन केबिन बनाने की अभी सिर्फ घोषणा ही हुई है । इसके अलावा ड्राइवर के लिए सिर्फ उतना ही स्पेस है जिसमें वह बैठ सके । सोने के लिए बहुत ही कम जगह । पिछले दिनों एक रिपोर्ट आई थी कि हमारे देश में सबसे ज्यादा हादसे सिर्फ इसलिए होते हैं, क्योंकि ड्राइवर पूरी तरह नींद नहीं ले पाते । अमेरिका और भारत के ट्रांसपोर्ट सेक्टर के बीच जमीन और आसमान जितना फर्क है । आखिर इस फर्क को कैसे खत्म किया जाएगा, क्योंकि जिस रफ्तार से हम चल रहे हैं , उससे तो कभी उनके समानांतर भी नहीं खड़े हो पाएंगे, क्योंकि हमारे यहां योजनाएं बनने और उनके लागू होने में ही सालों बीत जाते हैं । तब तक अमेरिका जैसे विकसित देश हमसे 10 कदम और आगे निकल जाते हैं । हम अपने देश को विदेशों की तर्ज पर विकसित करना चाहते हैं । हमारे मंत्री विदेशों में जाकर वहां का सिस्टम समझते हैं और उसे लागू करने के लिए कागजों में लकीरें खींचते हैं । लेकिन वे ये नहीं समझते कि हमारी भौगोलिक परिस्थितियां व अन्य चीजें उनसे बिलकुल अलग हैं ।
अमेरिकन रोड्स आर गुड , नॉट बिकॉज अमेरिका इज रिच, बट बट अमेरिका इज रिच बिकॉज अमेरिकन रोड्स आर गुड । इस सिद्धांत पर नितिन गडकरी रोड्स तैयार करवा रहे हैं ताकि हमारा देश भी अमीर बन सके, लेकिन इसके बीच में कई तरह के रोड़े भी खुद ही खड़े कर रहे हैं, जैसे टोल नाके, स्पीड गवर्नर आदि । जब तक टोल बैरियर्स सड़कों पर खड़े रहेंगे, तब तक न तो देश का ट्रांसपोर्ट सेक्टर विकास कर पाएगा और न ही हमारा देश । इसलिए अब जरूरत है कागजों में तैयार योजनाओं को जल्द से जल्द धरातल पर लाने की और हर काम के लिए समय सीमा निर्धारित करने की । जब तक समय के अनुसार काम नहीं होगा, हम कभी भी विकसित देशों की श्रेणी में खड़े नहीं हो सकेंगे । यहां काम की रफ्तार कछुए वाली है जबकि आईटी और युग में रफ्तार खरगोश वाली चाहिए । अगर रोड ट्रांसपोर्ट को वाकई में रेस लगवानी है तो उसे उबारने के लिए बजट में भी सहारा देना होगा और उनकी जायज मांगें जैसे टोल मुक्त भारत को मानना होगा । अगर ऐसा होता है तो भले ही हमें अमेरिका के बराबर खड़ा होने में समय लगेगा, लेकिन ये तय है कि साल दर साल हम दूरियां कम करने में कामयाब जरूर हो जाएंगे ।
– सतीश कुमार

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*


19 − six =